मोहब्बत का सफ़र ,मुस्कुराहटों की छाँव
कॉलेज की फिज़ाओं में एक नाम गूंजता था, अमन आरिफ़। वह एक संजीदा फ़िक्र नौजवान, जिसकी दुनिया किताबों, शायरी और क्लासेज के गिर्द घूमती थी। लेकिन उसकी ख़ामोशी दुनिया में हलचल तब मची जब शहनाज़ ने क़दम रखा। शहनाज़, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और बातों में बला की तासीर थी।
कॉलेज के सालाना फंक्शन की वह शाम आज भी अमन आरिफ़ के ज़हन में नक्श है। स्टेज पर गैदरिंग (Gathering) का शोर था, मगर अमन की नज़रें हुजूम में सिर्फ़ शहनाज़ को तलाश कर रही थीं।
उनकी पहली बाक़ायदा मुलाक़ात लाइब्रेरी के उस गोशे में हुई जहाँ लफ़्ज़ों की ख़ुशबू बसती थी। म
अमन ने अपनी डायरी से वही सतरें पढ़ीं जो उसने शहनाज के लिए लिखीं थीं,
”मरी कहानी का उरूज था तेरी मुस्कुराहटों की छांव में”
अफ़सोस कहानी वो मुकम्मल न हो सकी।
तेरी पलकों में छुपा मेरा ख्वाब है,मुस्कुरा के ज़रा तो देखले,
शहनाज़ ने मुस्कुरा कर देखा, मगर उसकी आँखों में एक अनकही झिझक थी। वह मुलाक़ातें जो कैंटीन की चाय से शुरू होकर कॉलेज के लॉन तक जाती थीं, इश्क़ का एक एसा मंसूबा बन गईं जिसका अंजाम किसी को मालूम न था।
वक़्त का पहिया घूमता रहा। कॉलेज के दिन ख़त्म होने को आए। अलविदाई तक़रीब (Farewell) का दिन था , अमन चाहता था कि अपने दिल की सारी बात कह दे, मगर फ़ासलों की दीवारें पहले ही बुलंद हो चुकी थीं। वजह कुछ मालूम नहीं, शहनाज़ की ख़ामोशी अमन के लिए एक मुअम्मा (पहेली) बन गई। वह लम्हा जब दोनों को एक दूसरे का साथ देना था, वहीं से राहें जुदा होने लगीं।
साथ मेरे तुझको चलना था, तेरे पांव कैसे रुक गए,
मिले भी तो क्या मिले? वही पुरानी दूरियां और वही फ़ासले जो न मिट सके।
अमन के नाम का जो जाम था, वह हालात के संगलाज़ रास्तों में कहीं छलक गया, उसके हिस्से में सिर्फ इंतज़ार की प्यास आई।
आज बरसों बाद भी अमन जब अपने कॉलेज के दिनों को याद करता है, तो उसे क्लासरूम की वह ख़ाली कुर्सियां और शहनाज़ का वह मासूम चेहरा याद आता है। उसने उसे भूलने की हज़ार कोशिशें कीं, मगर मोहब्बत के नक्श इतने गहरे थे कि मिटाए न मिट सके।
”तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं”
अब अमन के पास सिर्फ़ यादों का असासा (पूंजी) है। शहनाज़ की याद उसके लिए किसी मुरझाए हुए फूल की तरह नहीं, बल्कि उस शाखे-गुलाब की तरह है, जो जब भी माज़ी (अतीत) की हवा चलती है, तो लचक कर उसके दिल को मुअत्तर (सुगंधित) कर देती है।
लेकिन आज, कॉलेज की उन्हीं पुरानी राहों पर जहाँ कभी ख़ामोशियाँ पहरा देती थीं, एक नई सरगोशी सुनाई दी। अमन, पुस्तकालय की उन ऊँची अलमारियों के पीछे किसी किताब में नहीं, बल्कि ज़िंदगी के एक नए सफ़र के मुंतज़िर थे।
तभी फिज़ा में मोगरे की महक घुली और शहनाज़ सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में आज कोई झिझक नहीं, बल्कि एक साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ इक़रार था।
शहनाज़,”अमन, सुना है तुम्हारी डायरी के पन्ने अब भी मेरे ज़िक्र के बिना अधूरे हैं? कब तक इन अल्फ़ाज़ को काग़ज़ों में क़ैद रखोगे?”
अमन ने अपनी डायरी बंद की और उसकी जानिब देखा। उनकी नज़रों में बरसों का इंतज़ार एक पल में सिमट आया था।
अमन “शहनाज़, ये अल्फ़ाज़ क़ैद नहीं हैं, ये तो वो एहसास हैं जो हर रात मुझे सोने नहीं देते। वक़्त की पाबंदियों ने शायद हमारे क़दम रोके हों, लेकिन इन धड़कनों पर किसी का ज़ोर नहीं चला। मिलना और बिछड़ना तो महज़ एक इत्तिफ़ाक़ है, असल दास्तान तो वो है जो हम इस पल जी रहे हैं।”
शहनाज़ थोड़ा और करीब आई, उसकी आवाज़ में एक दिलकश खनक थी।
शहनाज़, “तो फिर आज इन दूरियों को यहीं दफ़्न कर देते हैं। लोग कहते हैं कि अधूरी कहानियाँ ही मुकम्मल होती हैं, मगर मुझे तुम्हारी मुस्कुराहटों की छाँव में अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ारनी है। क्या तुम ज़िंदगी की राह पर साथ चलोगे?”
आमन के चेहरे पर एक पुर-सुकून मुस्कान फैल गई। उन्होंने धीरे से शहनाज़ का हाथ थाम लिया। उसके सारे जिस्म में एक बर्क ( बिजली)सी दौड़ गई,यह महज़ हाथ पकड़ना नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक-दूसरे से सच्चा वादा था।
सूरज ढल रहा था और कॉलेज के लॉन में लंबी परछाइयां बन रही थीं। अमन और शहनाज़ साथ-साथ चल रहे थे। अब न तो कोई मुअम्मा था और न ही कोई पुरानी दूरी। वह ‘अलविदाई तक़रीब’ (Farewell) का दिन, जो कभी जुदाई का डर बनकर आया था, आज एक नई शुरुआत का गवाह बन गया।
राहें अब जुदा नहीं थीं, बल्कि एक ही मंज़िल की तरफ़ ग़मज़न हो चुकी थीं। अमन ने महसूस किया कि सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ यादों का असासा नहीं होती, बल्कि वो हिम्मत होती है जो वक़्त के संगलाज़ रास्तों को भी फूलों की सेज बना देती है।
”तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न होतीं, अच्छा हुआ कि अब तुझे याद करने की ज़रूरत ही न रही… क्योंकि तुम अब मेरे साथ हो।”
शहर की रौशनियाँ जाग रही थीं और उनकी मोहब्बत का अफ़साना, पहली बार अपनी मुकम्मल मंज़िल की तरफ़ कदम बढ़ा रहा था। यह दास्तान अधूरी होकर भी मुकम्मल हो चुकी थी, क्योंकि सच्ची मोहब्बत मंज़िलों की नहीं, एहसास की मोहताज होती है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
