ग़ज़ल
आजादी के परवानों के सपनो से मत घात करो
जिससे हो कमज़ोर वतन मत ऐसी कोई बात करो
धर्मों के झंडाबरदारो है ये फ़र्ज़ तुम्हारा तुम
धर्मों में धर्मों को वापस लाने की शुरुआत करो
पहले से ही भूख गरीबी बेकारी से जूझ रही
दुनियाँ में अलगाव बढ़ाकर मत मुश्किल हालात करो
वे जो मज़हब मज़हब करते रहते हैं दिन रात मियाँ
उनकी नीयत समझो उनकी असली मंशा ज्ञात करो
ऋषियों संतों सिद्धों और फ़कीरों की इस धरती पर
उन्मादी असुरों कुंठा में मत विष की बरसात करो
सिद्ध यही है मंत्र सुनो अनमोल ख़ज़ाना पाने का
नेकी का निर्यात करो तुम और दुआ आयात करो
अंतिम पथ में बंसल कुछ भी साथ न ले जा पाओगे
नाहक ही जीवन में मत छल और कपट दिन रात करो
— सतीश बंसल
