श्रीराम से वर्तमान युद्ध विभीषिका तक-‘अंतस्’ की अनवरत 80वीं काव्य-गोष्ठी

अंतस् की उत्कृष्ट 80 वीं काव्य-गोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए NOIDA SE श्री विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ ने गोष्ठी के श्री राम से वर्तमान युद्ध विभीषिका तक विस्तार लिए हुए फलक को रेखांकित करते हुए संस्था की अध्यक्ष डॉ पूनम माटिया को अति उत्तम सुखद-रुचिकर संयोजन-सञ्चालन के साधुवाद दिया जिसमें भीड़ से अलग काव्य के रसास्वादन का अवसर मिला|
चूँकि पूनम जी ने उस्ताद शायर स्व. गोविन्द गुलशन जी के अशआर याद किये तो विनय विक्रम जी ने भी उन्हें स्मरण किया- ‘किस-किस तरह से ख़ुद को संभाले हुए हैं हम/ मिट्टी की कीमतों को उछाले हुए हैं हम’| कर्नल प्रवीण त्रिपाठी द्वारा पारंपरिक छंद को सहेजते हुए निरंतर सृजन में लीन रहने को उद्धृत किया| कवि दुर्गेश अवस्थी का खिलंदड़ापन, भाषा का गाम्भीर्य, धृति बेडेकर की चटपटी-सी रचना और रोचक विषय-वस्तु को सराहा|
उन्होंने कहा, “कविता-रचना में अभिधा से अधिक अनकहे की ओर प्रयास करना चाहिए|” सोनम यादव के शब्द-चयन की चर्चा की, डॉ जप्रकाश गुप्त के काव्य में छायावाद की झलक, डॉ नीलम वर्मा की भाषा का लालित्य और पूनम माटिया की काव्य-प्रस्तुति में ‘वर्तमान से जुड़कर जागृत लेखन का परिचय’ रेखांकित किया| अंतस् के प्रभावी आयोजन की सराहना करते हुए इस अस्सी वें पड़ाव पर आगे शतकीय आयोजन तक पहुँचने के लिए शुभकामनायें प्रेषित कीं|
स्वयं के काव्य पाठ में चिट्ठी-पत्री के समय को स्मरण करते हुए बैरंग चिट्ठी का ज़िक्र किया| उच्च कोटि का मर्म स्पर्शी काव्य- “बैरँग चिट्ठी ने कही, बिना खुले वो बात/ सुबक-सुबक परदेसिया, रोया सारी रात”
पूनम माटिया द्वारा वाणी-वंदना के साथ आरंभ हुए काव्य-क्रम में कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नॉएडा, श्रीमती सोनम यादव, ग़ाज़ियाबाद, श्रीमती धृति बेडेकर, नागपुर, श्री दुर्गेश अवस्थी, साहिबाबाद, डॉ जयप्रकाश गुप्त, हरियाणा, डॉ नीलम वर्मा, दिल्ली तथा डॉ पूनम माटिया, दिल्ली ने मनोहारी उत्तम प्रस्तुतियाँ दीं|
श्री नरेश माटिया, श्रीमती पूनम सागर तथा अन्य प्रबुद्ध साहित्य-रसिक श्रोता आयोजन में उपस्थित रहे|
