दोहे – मन्जिल
ठोकर खाकर भी उठा, हार न थी मंजूर
तेज भाग कर मिल गयी, मंजिल जो थी दूर
एक पैर जब कट गया, हुआ न वो कमजोर
एक पैर से भी चला, वो मंजिल की ओर
मन्जिल उसको ही मिली, जिसको इसकी चाह
जिसने बाधा, शूल की, कभी न की परवाह
लक्ष्य भेदने के लिए, हासिल कर तरकीब
कर प्रयास कुछ और, है मंजिल बहुत करीब
— शालिनी शर्मा
