धर्म और चयन
किसने माँगा स्वर्ण सिंहासन,
किसने वन का शोक,
त्याग तिलक बन जगमगाया,
मिट गया सब लोक-विलोक।
मौन पथिक था जो चला,
आँसू संग विश्वास,
वही अंत में दीप बना,
वही अमर इतिहास।
एक ओर था घमंड गहन,
सेना का विस्तार,
एक ओर बस नाम था,
सत्य रूप अवतार।
छूट गए सब बाहुबल,
जब अंतर उठा काँप,
साथ जहाँ वह प्रेम था,
वहाँ लगी विजय पर छाप।
लोभ लहर सा टूट गया,
तट न पा सका ठौर,
धर्म धार बन बह चला,
निर्मल निश्चल भोर।
समय शिला पर लिख गया,
पीड़ा का उपहास,
जो खुद को खो कर जी गया,
वही बना इतिहास॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
