चुप्पी ओढ़ी किताबें
वों बूढ़ी किताबें थम गईं, मन चंचल हो उड़ चला,
शब्दों का सागर सूख गया , हर अक्षर जैसे मुड़ चला।
हर पन्ने में एक जहाँ, हर लफ़्ज़ में कभी गहराई थी,
वों अलमारी की शोभा बन, उस पर धूल ही चढ़ चला।
हम कभी कहानी में जीते थे, किरदारों के संग रोते थे,
पंद्रह सेकंड में सब सिमट, मन भवरा कहीं उड़ चला।
स्याही की खुशबू खो गई, कागज़ में वो अब बात नहीं,
मोबाइल की रोशनी में, आँखों का सपना झड़ चला।
किताबों की चुप्पी दीवारें, पूछें अब हर इंसान से,
कहाँ गया वो वक्त तुम्हारा, जो पढ़ जीवन गढ़ चला।
“मैं” अब भी ढूँढ रहा, उन लफ़्ज़ों की गर्माहट को,
जिसने छूकर मन की मिट्टी, कह चाँद में कदम बढ़ चला।
— सोमेश देवांगन
