कविता

आखिर क्या?

कभी कभी कुछ
हो जाता लेकिन क्या
ठीक-ठीक कुछ
कहा नहीं जा सकता।
बस इतना सा अहसास कि
कभी-कभी, बिना किसी अपेक्षा के,
बिना किसी स्वार्थ के भी
कुछ संबंध-से बन जाते हैं।

ऐसा भी होता है कि
दो लोग कभी मिले नहीं होते,
फिर भी एक अनजानी-सी पहचान
मन में जगह बना लेती है।
नज़रों में कोई गुस्ताख़ी नहीं,
कोई आग्रह नहीं,
बस एक सहज-सी आत्मीयता
जो बिना कहे भी बहुत कुछ कह जाती है।

कभी-कभी, केवल उपस्थिति ही
पर्याप्त हो जाती है,
और उसी में
एक अनकहा सम्मान,
एक मौन स्नेह
धीरे-धीरे आकार लेता है।

ऐसे क्षण आते हैं
जब कुछ भी विशेष नहीं घटता,
फिर भी बहुत कुछ घट जाता है
और वही क्षण
स्मृति में ठहर जाते हैं।

जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं,
और मन निःशब्द होकर भी
बहुत कुछ महसूस करता है।

शायद जीवन में
कुछ अनुभव ऐसे ही होते हैं
जो कहे नहीं जाते,
बस जिए जाते हैं…
और फिर
यादों में चुपचाप बस जाते हैं।

तुम यूँ ही रखना भी
और रहना भी।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com