हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – हिम्मत तो देखो अखबार पढ़ता है

अखबार के मुख्य पृष्ठ पर बड़े और बोल्ड शब्दों में लिखा होना चाहिये – कृपया कमज़ोर दिल वाले न पढ़े। पहले बच्चों में अखबार पढ़ने की आदत डाली जाती थी अब ध्यान रखा जाता है कि बच्चा अखबार न पढ़ ले। उनकी हिम्मत को सलाम जो रोज़ सुबह अखबार पढ़ते हैं अतिरिक्त योग्यता यह कि कई वर्षो से पढ़ रहे हैं।
इन दिनों जो बहुत रिस्की काम हैं उनमें एक काम अखबार पढ़ना भी है। अखबार पढ़ने के लिये साक्षर भर होना पर्याप्त नही है इसके लिये जिगरा चाहिये जिगरा। जो लोग अखबार नही पढ़ते हैं वे आज भी यही समझते हैं कि नफ़रत में हत्या की जाती है, दुश्मन की पीठ में छुरा घोपा जाता है, पुत्र माँ – बाप की सेवा करते हैं, नारी पतिता ही होती है। जो अखबार पढ़ते हैं वे इस भ्रम में नही हैं।
अब हाँरर्र फिल्मे और अपराध कथाओं वाली पत्रिकाओं का चलन कम हो गया है क्योंकि इनकी सामग्री अखबार में मिल जाती हैं। जिन लोगों की बी. पी. बढ़ने और हार्ट अटैक से मौत हुई है वे सब सुबह अखबार पढ़े थे। हार्ट के मरीज़ को डाँक्टर अखबार न पढ़ने की हिदायत दे रहे है। जो स्वस्थ हैं उन्हें भी मशविरा दिया जा रहा है कि सुबह उठते ही अखबार पढ़ने के बजाये दोपहर में पढ़ने की आदत डालिये।
सोलह पृष्ठों का अखबार सोलह कमरों वाली भुतहा हवेली है। हर कमरे में अलग अलग जुर्म की डायन ने कब्जा कर लिया है और दहशत फैला रही है। अखबार जितने चिकने कागज़ और सुंदर छपाई में आ रहे हैं ख़बरे उतनी ही रफ़ और असुंदर है। पाठक चाहता है ख़बरे ख़ुशी और राहत वाली हो कागज़ और छपाई उतनी अच्छी नही होगी तो भी हमें दिक्कत नही है। हथेली जैसे कागज़ पर तलुवे जैसी खबरे के बदले तलुवे जैसे कागज़ पर हथेली जैसी ख़बरे हो तो भी चलेगा।
अखबार में रोज़ाना दिन और तारीख़ भर ही तो बदलती है बाकी ख़बरे तो वही की वही रहती है। अंतिम पृष्ठ में स्थानीय, मध्य पृष्ठ में राष्ट्रीय और प्रथम पृष्ट में अन्तराष्ट्रीय गुंडा गर्दी के समाचार होते हैं, हाँ निधन कॉलम में रोज़ अलग अलग लोगों के निधन की सूचना होती है। इस बात के लिये अखबार की जितनी प्रशंसा की जाये कम है।
किताब पढ़ना और अखबार पढ़ना एक जैसा पढ़ना नही होता। किताब में सब कुछ सिलसिलेवार और अनुशासित होता है लेकिन अखबार में खबरे छपी तो होती है पर विज्ञापन के बीच में जो छपी है वो छिपी है उसे ढूँढना भी होता है। पहले अखबार में ख़बरों के बीच विज्ञापन होते थे अब विज्ञापनों के बीच खबरे होती है। विज्ञापनों के बीच ख़बरों को पकड़ना झाड़ियों में छिपे ख़रगोश को पकड़ने जैसा काम है।

जब लगातार हिंसा की ख़बरों के कारण अखबार की बदनामी होने लगी तो एक दिन सभी अखबार मार्निंग वाँक पर एकत्रित हुए और इस बात पर चिंता व्यक्त किये कि लोग हमें बुरा भला कह रहे हैं जबकि हम तो बस घटना की सूचना देते हैं हम घटना के ज़िम्मेदार तो नही है।

सभी अखबारों ने सामूहिक रूप से प्रार्थना करी कि सुख, शांति, प्रेम, सदभावना पृथ्वी के कोने कोने में पसर जाये ताकि अखबार अपने पाठकों को सुबह सुबह राहत भरी ख़बरें पहुंचा सके।

— अख़तर अली

अखतर अली

जन्म 14 अप्रेल 1960, रायपुर (छत्तीसगढ़) मूलतः व्यंग्यकार, विगत 40 वर्षो से निरंतर लेखन जारी। व्यंग्य, समीक्षा, आलेख एवं लघु कथाओं का निरंतर लेखन। अमृत संदेश, नव भारत, दैनिक भास्कर, नई दुनिया,रांची एक्सप्रेस, जनवाणी, हरिभूमि, राजस्थान पत्रिका,पंजाब केसरी, वागर्थ, बालहंस,सुखनवर, सामानांतरनामा, कलावासुधा, इप्टा वार्ता, सूत्रधार, कार्टून वाच, दुनियाँ इन दिनों उदंती.काँम, साहित्य सुधा, साहित्यकथा, रचनाकार, अट्टहास, विभोम स्वर, सदभावना दर्पण आदि आदि पत्रिकाओं में निरंतर रचनाये प्रकाशित। आज की जनधारा में व्यंग्य स्तंभ हबीब तनवीर से रंगमंच का प्रशिक्षण। अनेको नाट्य स्पर्धाओं में सम्मेलनों, गोष्ठियों में शिरकत। लिखित प्रमुख व्यंग्य नाटक – निकले थे मांगने किस्सा कल्पनापुरका विचित्रलोक की सत्यकथा नंगी सरकार अमंचित प्रस्तुति खुल्लम खुल्ला सुकरात अजब मदारी गजब तमाशा एक अजीब दास्ताँ दर्द अनोखे प्यार के नाक। प्रमुख नाट्य रूपांतरण – ईदगाह (मुंशी प्रेमचंद) किस्सा नागफनी (हरिशंकर परसाई) अकाल उत्सव (गिरीश पंकज) मौत की तलाश में (फ़िक्र तौसवी) टोपी शुक्ला (राही मासूम रज़ा) बाकी सब खैरियत है (सआदत हसन मंटो) असमंजस बाबू (सत्यजीत रे) जितने लब उतने अफसाने (राजी सेठ) एक गधे की आत्म कथा (कृष्ण चंदर) बियालिस साल आठ महीने (सआदत हसन मंटो) सात दिन तुमने क्यों कहा था कि मै खूबसूरत हूं (यशपाल) काली शलवार (एक पात्रीय) (मंटो) नाक (निकोलाई गोगोल) प्रमुख नुक्कड़ नाटक – नाटक की आड़ में, लाटरी लीला, खदान दान। सम्पर्क – अखतर अली,निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर। मो.न. 9826126781 Email – akhterspritwala@gmail.com