जाल और सवाल
उनकी एक चूक
किसी के लिए पहाड़ बन जाती है,
और निर्दोष भी
अपना ही चेहरा छुपाता है।
क्यों नहीं समझते कुछ लोग
दूसरे की विवशता का भार,
क्यों उसकी आवश्यकता को
बना देते हैं दूरी की दीवार।
वो तो विश्वास के धागों से
आपके खेल में बंधा है,
यह आप सबकी जिम्मेदारी है
कि उसे न कहना पड़े—
“मेरा प्रश्न अब तक अनसुलझा है।”
यदि कोई आपके कारवां का सिपाही है,
तो उसकी थकान भी आपकी गवाही है,
आपकी दुनियादारी उसने भी निभाई है,
फिर क्यों उसकी पीड़ा पर चुप्पी छाई है?
अब तो सबकी कलम में
एक ही स्याही बहती है,
पर शब्दों के जाल में उलझी हुई
सच्चाई ही सबसे कम कहती है।
आपके दिखाए ख्वाबों के तंतु में
वो स्वयं को लपेट चुका है,
अपने ही हाथों से
फंसने का जाल बिछा चुका है।
तो बताओ—
जब अपनी ही बनाई इस दुखद दशा में
वो तड़पता है हर पल,
तब अपने ही लोगों के बीच
किससे करे सवाल?
— राजेन्द्र लाहिरी
