बैल हूँ मैं कभी मेरा भी था ज़माना
जब निकला खाने की तलाश में इधर उधर
तो मैं आवारा हो गया
लोगों को अब मैं अच्छा नहीं लगता
मेरी शक्ल देखना भी ना गवारा हो गया
जब तक ताकत थी मुझमें
मैंने पूरा जोर लगाया
खेतों में फसलें लहलहाई
उम्मीद से ज़्यादा अन्न उगाया
कंधे मेरे दुख गए हल खींचते
फिर भी मैंने जोर लगाया
सुहागे पर बजन भी रखा खूब दबाया फिर भी
चुपचाप चलता रहा न चीखा न चिल्लाया
कभी खूब खिलाते थे मुझे
रखते थे मेरा भरपूर ख्याल
छोड़ दिया घर से अब हो गया आवारा
देखते ही दौड़ते हैं मारने ऐसा हो गया अब हाल
समय का खेल है बदल गया ज़माना
कभी सेवा की थी अब मुझ पर है सबका निशाना
ऐसा लगता है जैसे जीवन नरक बन गया
वह भी दिन थे जब मुझको मिलता था सबसे पहले खाना
— रवींद्र कुमार शर्मा
