हास्य-व्यंग्य – कवि कविता लिखकर अमर होना चाहता है
कवि कविता लिखकर अमर होना चाहता है। अपना भविष्य बनाना चाह रहा है। उसकी कविता से कोई सामाजिक परिवर्तन हुआ कि नहीं उससे कोई लेना-देना नहीं। वह लिखना चाहता है, जीवन का समस्त पल साहित्य में न्यौछावर कर देना चाहता है।
वह जो कवितायें लिखता है। उसकी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा है। बहुत ही नाजों से पाल-पोस कर लिखता है। इन कविताओं से अमर होना चाहता है। मरने से पहले वह साहित्य का एक-एक पल संवारा करता है। तेल मालिस, उबटन और आंखों में काजल लगाकर अपनी कविता को कालजयी बनाना चाहता है।
उस कवि को कोई चिंता नहीं कि व्यक्ति में कोई नई सोंच आई की नहीं। कोई दुष्ट अपनी दुष्टता छोड़ा कि नहीं। सामाजिक क्रांति हुई कि नहीं। वह जानता है कि जीवन एक दिन खत्म हो जायेगा। वह लिखकर जिंदा रहना चाहता है ताकि उसके बेटे, नाती-पोते आने वाली पीढ़ियां उसे याद करती रहे और समाज भी याद करे।
एक कवि या लेखक ऐसे नहीं मरना चाहता है। कुछ भाव विचार छोड़ जाना चाहता है। उसे अपनी हर रचना में महानता की खुशबू आती है। उसकी आत्मा प्रसन्न होती है जब कोई वाह-वाह कर उठता है। अद्भुत लेखन कह दिया तो उसके अंदर महान साहित्यकार होने का गुण कौंधने लगता है। तमाम ऐसे कलमकार अपनी रचना का यशोगान सुनना चाहते हैं।
किसी अखबार या पत्रिका में छप गया तो समझो निराला, महादेवी या टैगोर समझ लेते हैं। उसका ऐसा बखान करते हैं जैसे ससुराल से कीमती सोने की जेवरात मिल गयी हो।
हे कवियों! ऐसा लिखो ताकि सामाजिक समानता ला सको। बिगड़े लोग सुधर जाये। एक नई दुनिया बन सके। स्वार्थ से लिखा साहित्य अमर नही हो पाता है।
— जयचन्द प्रजापति “जय’
