आल्हा छंद गीत – पर्वों से संचार प्रवाह
व्यग्र विकल चिंतारत रहते, उन में पर्व भरें उत्साह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।
नवल राग भरते खुशियों के, पर्व मनाते जन भूलोक ।
आस्था के हैं पर्व हमारे, जीवन में भरते आलोक ।।
आशाओं के दीप जलाकर, पर्व सुगम करते हैं राह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वो से संचार प्रवाह ।।
सब मिलकर त्यौहार मनाते, खुशी मनाने की यह रीत ।
सज-धज कर मेले में जाते, रास रचाते गातें गीत ।।
अर्थ पर्व का समझे जो भी, वही निकाले मुख से वाह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।
नीरस जीवन में समरसता, लेकर आते हैं त्यौहार ।
पर्व भरे सौहार्द दिलों में, आगत का करते सत्कार ।।
शबरी जैसी भक्ति भावना, मिले स्वर्ग में उन्हें पनाह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।
— लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’
