गीत/नवगीत

आल्हा छंद गीत – पर्वों से संचार प्रवाह

व्यग्र विकल चिंतारत रहते, उन में पर्व भरें उत्साह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।

नवल राग भरते खुशियों के, पर्व मनाते जन भूलोक ।
आस्था के हैं पर्व हमारे, जीवन में भरते आलोक ।।
आशाओं के दीप जलाकर, पर्व सुगम करते हैं राह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वो से संचार प्रवाह ।।

सब मिलकर त्यौहार मनाते, खुशी मनाने की यह रीत ।
सज-धज कर मेले में जाते, रास रचाते गातें गीत ।।
अर्थ पर्व का समझे जो भी, वही निकाले मुख से वाह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।

नीरस जीवन में समरसता, लेकर आते हैं त्यौहार ।
पर्व भरे सौहार्द दिलों में, आगत का करते सत्कार ।।
शबरी जैसी भक्ति भावना, मिले स्वर्ग में उन्हें पनाह ।
मानव मन आनंदित होता, पर्वों से संचार प्रवाह ।।

— लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’

लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

जयपुर में 19 -11-1945 जन्म, एम् कॉम, DCWA, कंपनी सचिव (inter) तक शिक्षा अग्रगामी (मासिक),का सह-सम्पादक (1975 से 1978), निराला समाज (त्रैमासिक) 1978 से 1990 तक बाबूजी का भारत मित्र, नव्या, अखंड भारत(त्रैमासिक), साहित्य रागिनी, राजस्थान पत्रिका (दैनिक) आदि पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, ओपन बुक्स ऑन लाइन, कविता लोक, आदि वेब मंचों द्वारा सामानित साहत्य - दोहे, कुण्डलिया छंद, गीत, कविताए, कहानिया और लघु कथाओं का अनवरत लेखन email- lpladiwala@gmail.com पता - कृष्णा साकेत, 165, गंगोत्री नगर, गोपालपूरा, टोंक रोड, जयपुर -302018 (राजस्थान)