सामाजिक

निर्वाह ही विवाह है

विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो आत्माओं का ऐसा पवित्र बंधन है जिसे समय, परिस्थितियाँ और जीवन की परीक्षाएँ निरंतर परखती हैं। इस बंधन की सच्ची पहचान न तो केवल रस्मों में होती है और न ही बाहरी दिखावे में, बल्कि उसे जीवनभर निभाने की निष्ठा में छिपी होती है। इसलिए कहा गया है निर्वाह ही विवाह है।

भारतीय संस्कृति में राम और सीता का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजमहल का सुख हो या वनवास की कठोर तपस्या, हर परिस्थिति में उन्होंने एक-दूसरे के प्रति विश्वास, समर्पण और कर्तव्य का निर्वाह किया। उनका संबंध केवल प्रेम तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें त्याग, धैर्य और मर्यादा का अद्भुत संतुलन भी था।

विवाह का वास्तविक अर्थ यही है कि जीवन के हर मोड़ पर चाहे वह प्रसन्नता का क्षण हो या संघर्ष का समय दोनों एक-दूसरे का सहारा बनें। एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार कर, गुणों को संजोकर, रिश्ते को सहेजना ही सच्चा निर्वाह है। जब संबंध निभाने का भाव सच्चा होता है, तब छोटी-छोटी कठिनाइयाँ भी रिश्ते को और मजबूत बना देती हैं।

आज के समय में अक्सर विवाह को केवल एक सामाजिक आयोजन या औपचारिकता मान लिया जाता है, परंतु इसका वास्तविक महत्व तभी समझ आता है जब जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। वही दंपत्ति सफल होते हैं, जो हर परिस्थिति में साथ निभाने का संकल्प लेकर आगे बढ़ते हैं।

अतः यह स्पष्ट है कि जहाँ निभाने का भाव है, वहीं विवाह की पवित्रता और सफलता है। केवल साथ होना पर्याप्त नहीं, बल्कि साथ निभाना ही विवाह की आत्मा है।
निभे जहाँ हर साँस में, सच्चा वही लगाव।
निर्वाह बने जो प्रेम का, वही सफल विवाह।।

— सोमेश देवांगन

सोमेश देवांगन

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