चेहरे से खुशी गायब
आज चेहरे से वो खुशी गायब थी,
जो तूने साथ में रहकर कमाई थी।
कितने ‘हँसी’ थे वो छोटे-छोटे पल,
खुशियों को बाँटकर जाते निकल।
यूं ही तेरे संग जो शामें खिलती थीं,
अब चुपचाप ढल निकल जाती हैं।
तेरी बातों की वो ‘मीठी-सी’ खुशबू,
अब सिर्फ़ हवा में ही ‘खो’ जाती है।
साथ था तो सब अपना-सा लगता,
अपनी राहें भी आसान हो गईं थीं।
अब तन्हाई के इस सफर में भटका,
हर कदम पे पहचान कुछ जुदा थी।
तू गया तो जानी गलतियाँ थी मेरी,
उधार की थीं खुशियाँ जो की कॅरी।
वह रोशनी भी ‘चेहरे’ की थी गायब,
वो आपके प्यार की खुशियाँ नायब।
— संजय एम तराणेकर
