राजनीति

व्यापक जन आंदोलन ही लगा सकता है भ्रष्टाचार पर रोक

भ्रष्टाचार आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने उपस्थित सबसे जटिल और गहरे संकटों में से एक है। यह केवल आर्थिक संसाधनों की चोरी या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता, सामाजिक न्याय, विकास की गति और नागरिकों के नैतिक मनोबल को भी प्रभावित करता है। अनेक देशों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध केवल कानून बनाना या दंडात्मक प्रावधान पर्याप्त नहीं होते; जब तक समाज के व्यापक वर्ग की सक्रिय भागीदारी और जागरूकता नहीं होती, तब तक भ्रष्टाचार अपनी संरचनात्मक जड़ों के साथ बना रहता है। यही कारण है कि इतिहास और समकालीन राजनीति दोनों इस निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं कि भ्रष्टाचार पर वास्तविक और स्थायी रोक केवल व्यापक जन आंदोलन के माध्यम से ही संभव है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार की स्थिति को मापने के लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक एक महत्वपूर्ण मानक माना जाता है। इस सूचकांक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत को 100 में से 39 अंक प्राप्त हुए और वह 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा, जो यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की चुनौती अभी भी गंभीर रूप से मौजूद है और वैश्विक औसत से नीचे बनी हुई है।  यह स्थिति केवल भारत तक सीमित नहीं है; विश्व के अधिकांश देशों में भ्रष्टाचार संस्थागत और संरचनात्मक रूप में मौजूद है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह समस्या केवल प्रशासनिक कमजोरी का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से जुड़ी हुई है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानूनी ढांचा किसी भी लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है। भारत में लोकपाल, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, सूचना का अधिकार कानून, और विभिन्न सतर्कता तंत्रों की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी कि सत्ता और प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सके। परंतु व्यवहारिक स्तर पर यह भी देखा गया है कि केवल संस्थागत तंत्र भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं कर पाए हैं। कई मामलों में जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी या प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पातीं। इससे जनता में यह धारणा बनती है कि भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में दोषियों को दंडित करना कठिन है, जबकि छोटे स्तर पर कार्यवाही अपेक्षाकृत आसान होती है।

यहीं पर जन आंदोलन की भूमिका निर्णायक बनती है। जब नागरिक स्वयं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, सड़कों पर उतरते हैं, जनमत बनाते हैं और शासन से पारदर्शिता की मांग करते हैं, तब सरकारें और संस्थाएं अधिक उत्तरदायी बनने के लिए बाध्य होती हैं। भारत में सूचना का अधिकार कानून का पारित होना और उसके बाद उसका व्यापक उपयोग इस बात का प्रमाण है कि जब नागरिक संगठित होकर पारदर्शिता की मांग करते हैं, तो शासन व्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन संभव हो जाते हैं। सूचना के अधिकार के माध्यम से अनेक घोटाले उजागर हुए, सरकारी योजनाओं में अनियमितताओं का खुलासा हुआ और आम नागरिक को पहली बार प्रशासनिक फाइलों तक पहुंच का अधिकार मिला, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक प्रभावी सामाजिक दबाव बनाया।

जन आंदोलन की शक्ति का सबसे बड़ा प्रभाव यह होता है कि वह भ्रष्टाचार को केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहने देता, बल्कि उसे नैतिक और सामाजिक प्रश्न बना देता है। जब समाज में यह भावना विकसित होती है कि रिश्वत लेना या देना केवल एक ‘व्यवहारिक’ या ‘सुविधाजनक’ विकल्प नहीं, बल्कि एक अनैतिक और समाज विरोधी कृत्य है, तब भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकृति घटने लगती है। अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि जिन देशों में नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और नागरिक समाज की सक्रियता अधिक होती है, वहाँ भ्रष्टाचार का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है, क्योंकि वहां सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को निरंतर सामाजिक निगरानी का सामना करना पड़ता है।

भारतीय संदर्भ में वर्ष 2011 का जनलोकपाल आंदोलन इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि किस प्रकार व्यापक जन समर्थन से भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाया जा सकता है। उस समय विभिन्न शहरों में लाखों लोगों ने सड़कों पर उतरकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून और पारदर्शी शासन की मांग की थी। इस आंदोलन ने न केवल राजनीतिक दलों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बाध्य किया, बल्कि भ्रष्टाचार जैसे विषय को आम नागरिक की रोजमर्रा की चर्चा का हिस्सा बना दिया। यह जनदबाव ही था जिसने अंततः लोकपाल कानून के पारित होने की प्रक्रिया को तेज किया और उसे राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल कराया।

भ्रष्टाचार केवल उच्च स्तर की नीतिगत अनियमितताओं तक सीमित नहीं होता; वह दैनिक जीवन के छोटे–छोटे कार्यों में भी दिखाई देता है—जैसे सरकारी कार्यालयों में काम कराने के लिए रिश्वत देना, ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर चालान से बचने के लिए पैसे देना, या सार्वजनिक सेवाओं में दलालों की भूमिका स्वीकार कर लेना। जब समाज स्वयं इन प्रथाओं को ‘सामान्य’ या ‘अनिवार्य’ मान लेता है, तब भ्रष्टाचार एक सांस्कृतिक समस्या का रूप ले लेता है। ऐसे में केवल दंडात्मक कानूनों से अधिक प्रभावी उपाय यह है कि समाज में नैतिक जागरूकता और सामूहिक प्रतिरोध की भावना विकसित की जाए। व्यापक जन आंदोलन इसी चेतना को जगाने का माध्यम बनता है।

डिजिटल युग में जन आंदोलन की प्रकृति और भी अधिक प्रभावशाली हो गई है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन याचिकाओं और डिजिटल अभियानों के माध्यम से नागरिक अब बहुत कम समय में बड़े पैमाने पर जनमत तैयार कर सकते हैं। भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जानकारी तेजी से फैलती है और प्रशासन पर त्वरित प्रतिक्रिया देने का दबाव बनता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक आंदोलनों को एक नया आयाम दिया है, जिससे नागरिक समाज की आवाज पहले की तुलना में अधिक संगठित और प्रभावी हो गई है। हालांकि इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जानकारी की सत्यता और जिम्मेदार अभिव्यक्ति का ध्यान रखा जाए, ताकि आंदोलन तथ्यपरक और विश्वसनीय बने रहें।

जन आंदोलन की सफलता का एक महत्वपूर्ण आधार उसकी निरंतरता और व्यापकता होती है। यदि आंदोलन केवल कुछ समय के लिए या सीमित समूह तक सीमित रह जाए, तो उसका प्रभाव भी अस्थायी होता है। इसके विपरीत, जब आंदोलन दीर्घकालिक रणनीति, स्पष्ट मांगों और शांतिपूर्ण जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ता है, तब वह शासन की नीतियों और संस्थागत ढांचे में स्थायी परिवर्तन ला सकता है। दुनिया के कई देशों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों ने संवैधानिक संशोधन, चुनावी सुधार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे बड़े बदलावों को संभव बनाया है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जन आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक और रचनात्मक समाधान प्रस्तुत करना भी होना चाहिए। यदि आंदोलन केवल आक्रोश या असंतोष तक सीमित रह जाए और ठोस नीतिगत सुझाव न दे, तो उसकी ऊर्जा धीरे–धीरे समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत, जब नागरिक समाज कानून विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया के साथ मिलकर ठोस सुझाव और प्रारूप तैयार करता है, तब आंदोलन शासन के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि मार्गदर्शन का स्रोत भी बन जाता है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में मीडिया की भूमिका भी जन आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है। स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने, जनमत तैयार करने और सत्ता को जवाबदेह बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। परंतु मीडिया तभी प्रभावी हो सकता है जब उसे समाज का व्यापक समर्थन और विश्वास प्राप्त हो। यदि नागरिक स्वयं भ्रष्टाचार के मुद्दों पर उदासीन रहें या उन्हें केवल राजनीतिक प्रचार मानकर अनदेखा करें, तो मीडिया की जांच और खुलासों का भी अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए व्यापक जन जागरूकता और सक्रियता ही मीडिया के प्रयासों को सार्थक बनाती है।

भ्रष्टाचार का आर्थिक प्रभाव भी अत्यंत गंभीर होता है। यह सार्वजनिक परियोजनाओं की लागत बढ़ाता है, संसाधनों का गलत आवंटन करता है और निवेश के वातावरण को प्रभावित करता है। जब किसी देश में भ्रष्टाचार का स्तर अधिक होता है, तो विदेशी निवेशक और उद्योगपति भी वहां निवेश करने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था का भरोसा नहीं होता। इस प्रकार भ्रष्टाचार केवल नैतिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक विकास में भी बाधक बनता है। व्यापक जन आंदोलन जब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सुधारों और बेहतर निवेश वातावरण की दिशा में भी योगदान देता है।

लोकतंत्र की मूल आत्मा जनता की सहभागिता और सतर्कता में निहित होती है। यदि नागरिक केवल मतदान तक अपनी भूमिका सीमित कर दें और उसके बाद शासन की गतिविधियों से स्वयं को अलग कर लें, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं धीरे–धीरे औपचारिकता मात्र बनकर रह जाती हैं। इसके विपरीत, जब नागरिक नियमित रूप से प्रश्न पूछते हैं, सूचना मांगते हैं, शांतिपूर्ण विरोध दर्ज करते हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामूहिक रूप से खड़े होते हैं, तब लोकतंत्र जीवंत और प्रभावी बना रहता है। यही सतत नागरिक भागीदारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे मजबूत सुरक्षा कवच सिद्ध होती है।

अंततः यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार केवल कानून, अदालत या जांच एजेंसियों के माध्यम से समाप्त होने वाली समस्या नहीं है। यह एक ऐसी सामाजिक प्रवृत्ति है जो तभी कमजोर पड़ती है जब समाज स्वयं उसे अस्वीकार कर दे और उसके विरुद्ध संगठित होकर खड़ा हो। व्यापक जन आंदोलन इसी सामाजिक अस्वीकृति को स्वर और शक्ति प्रदान करता है। जब नागरिक यह तय कर लेते हैं कि वे न रिश्वत देंगे, न लेंगे, और किसी भी प्रकार की अनियमितता के विरुद्ध सामूहिक रूप से आवाज उठाएंगे, तब भ्रष्टाचार की जड़ें स्वतः कमजोर होने लगती हैं। इसलिए यह निष्कर्ष अत्यंत यथार्थपरक है कि व्यापक, जागरूक और निरंतर जन आंदोलन ही वह प्रभावी माध्यम है जो भ्रष्टाचार जैसी गहरी और बहुआयामी समस्या पर वास्तविक और स्थायी नियंत्रण स्थापित कर सकता है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563