दिल्ली की हवेली
दिल्ली की गलियां और वो पुर-असरार चेहरा
पुरानी दिल्ली की वो तंग और तारीख़ (अंधेरी) गलियां, जहां हवाओं में आज भी मुग़लई खानों की सोंधी खुशबू और उर्दू अदब की तहजीब घुली हुई है, इस अलमिया (त्रासदी) की गवाह बनीं। वहां की एक बोसीदा (जर्जर) मगर पुर-शिकोह (शानदार) हवेली के झरोखे से वो उसे अक्सर देखा करता था। कई दिनों से वो उस लड़की के हुस्न के सहर (जादू) में गिरफ़्तार था। लड़की क्या थी, गोया किसी शायर का अधूरा ख़्वाब या संग-ए-मरमर से तराशा हुआ कोई शाहकार। उसके चेहरे पर हया का एक गहरा गिलाफ था और आंखों में एक ऐसी मसहूर-कुन (मंत्रमुग्ध करने वाली) गहराई थी जिसमें वो शख़्स अपनी पूरी हस्ती डुबोने के लिए बेताब रहता था।
कई दिनों तक हालात ऐसे रहे कि उससे मुलाक़ात का कोई ज़रिया ही न बन पाया। वो दूर से उसे देखता और अपनी ही धड़कनों के शोर में उलझा रहता। असल में, उस लड़की में उसकी दिलचस्पी महज़ इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कशिश थी जो उसे बेचैन रखती थी। फ़िर एक रोज़ मुकद्दर ने साथ दिया और एक पुराने से आलीशान रेस्टोरेंट में दोनों का सामना हुआ। बातों का सिलसिला क्या चला, मानो लफ़्ज़ों के रूप में मिश्री घुलने लगी।
इश्क़ का परवान चढ़ना और वो मख़मली पर्दे
उस मुलाक़ात के बाद मुलाक़ातों का एक सिलसिला चल निकला। वो लड़की उसे बहुत कम उम्र की एक हसीन दोषीजा (युवती) महसूस होती थी। उसके चेहरे पर हमेशा एक ख़ास किस्म का नफ़ीस (बारीक) मेकअप रहता था जो उसके हुस्न को दो-आतिशा (दुगना) कर देता था। मगर एक बात उस शख़्स को हमेशा खटकती थी,उस लड़की ने अपने हाथों पर हमेशा रेशमी मोजे पहने होते थे।
एक रोज़, ऐसी ही एक पुर-कैफ़ मुलाक़ात में, जब जज़्बात का समंदर अपनी हदें लांघने लगा, तो उस शख़्स ने बे-इख्तियार चाहा कि उस लड़की के हाथ को चूमकर अपने इश्क़ का इज़हार कर दे। उसने बड़े अरमान से उसका हाथ थामना चाहा, मगर उस लड़की ने एक अजीब सी झुरझुरी ली और बड़ी नज़ाकत मगर सख़्ती से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसने उसे समझाने की कोशिश की कि “ये मुमकिन नहीं, अभी रुक जाओ, हक़ीक़त के चेहरे से पर्दा उठने में वक्त है।” मगर वो शख्स, जो हुस्न की ‘चमकती चांदी’ का असीर (कैदी) हो चुका था, भला इन दलीलों को कहां मानने वाला था। उसकी मुसलसल जिद के आगे हारकर, आख़िर एक शाम उस लड़की ने उसे अपनी हवेली पर दावत-ए-ख़ास दी।
हवेली का मंज़र और इंकशाफ-ए-हकीक़त से भरा हुआ था।
जब वो हवेली के भारी दरवाज़े से अंदर दाख़िल हुआ, तो वहां का सन्नाटा उसे डराने लगा। हवेली की दीवारें जैसे गुज़रे हुए वक्त की कहानियां सुना रही थीं। आंगन में रात की रानी की तेज़ महक फ़ैली थी और दालान में मद्धम रोशनी के चिराग़ जल रहे थे। सामने वो लड़की बैठी थी,वही लिबास, वही बनाओ-सिंगार और वही चान्दी जैसी चमकती रंगत। मगर आज उसकी आंखों में एक अजीब सा इस्तराब (बेचैनी) और रूहानी दर्द था।
उसने धीमी और लरजती (कांपती) आवाज़ में कहा, “तुम मेरे इस रूप के दीवाने हो ना? तुमने बार-बार मेरे इन हाथों को छूना चाहा था जिन्हें मैंने इन मख़मली मोजों में छुपा रखा था। तुम जिस हुस्न की परस्तिश (पूजा) कर रहे हो, आज उसकी असलियत देख लो।”
उसने बड़े धीरे से अपने हाथों के मोजे उतारे। उस शख़्स के पैरों तले ज़मीन निकल गई। उन ख़ूबसूरत मोजों के नीचे मख़मल जैसी उंगलियां नहीं थीं, बल्कि बरसों की सख़्त मशक्क़त, कड़े हालात और किसी पुराने हादसे की वजह से झुलसा हुआ काला गोश्त और टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियां थीं। ये वो हाथ थे जो किसी शहज़ादी के नहीं, बल्कि जिंदगी की जंग हारते हुए किसी के हो सकते थे।
जब उसने हक़ीक़त देखी उसका इश्क़ का नशा काफ़ूर हो गया।
हैरत और खौफ़ का सिलसिला अभी थमा नहीं था। उस लड़की ने मेज़ पर रखा एक रूमाल उठाया और अपने चेहरे की उस ‘चमकती चांदी’ यानी मेकअप की परतों को साफ करना शुरू किया। जैसे-जैसे रंग उतरते गए, उस हुस्न के नक़ाब के नीचे से एक जईफ़ (वृद्ध), झुर्रियों भरी और वक्त की मार खाई हुई एक आधेड़ उम्र औरत का चेहरा उभरने लगा। वो कोई कम उम्र दोशीज़ा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी हस्ती थी जिसने दुनिया की नज़रों से अपनी महरूमी और अपनी ढलती उम्र को छुपाने के लिए इस बनावटी हुस्न का सहारा लिया था।
उस शख़्स का वो जज़्बा, जिसे वो ‘इश्क’ का नाम दे रहा था, एक लम्हे में गायब हो गया। उसके अंदर की तमाम तड़प अब नफ़रत और दहशत में बदल चुकी थी। उसे एहसास हुआ कि उसकी मोहब्बत तो सिर्फ़ जिस्म की नुमाइश और ख़ाल की चमक तक महदूद थी।
उस औरत ने नम आंखों और एक दर्दनाक मुस्कुराहट के साथ उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा, “क्या इश्क़ सिर्फ़ चहरो की ताबानी (चमक) और इस चमकती हुई चांदी जैसी चमकती गोरी चमड़ी तक ही सीमित है? क्या तुम इन झुर्रियों और झुलसे हुए हाथों के पीछे छुपे उस दिल को नहीं देख सके जो सिर्फ़ तुम्हारी एक सच्ची झलक और रूहानी राहत का मुंतजिर था? क्या दिल से दिल को राहत पहुंचाना वाक़ई इतना मुश्किल है कि इंसान सिर्फ़ बाहरी चमक-धमक में खोकर रह जाए?”
वह शख़्स कोई जवाब न दे सका। उसकी ज़ुबान तालू से चिपक गई। वह जिसे रूहानी रिश्ता समझ रहा था, वह महज उसकी आंखों का एक बड़ा धोका (सराब) था। वह बग़ैर कुछ कहे, बोझिल क़दमों और शर्मिंदा रूह के साथ उस हवेली की सीढ़ियां उतरकर भागने लगा। वह उन तंग गलियों की भीड़ में खो जाना चाहता था ताकि अपनी ही नज़रों से बच सके।
पीछे हवेली के उस वीरान दालान में वो औरत तन्हा रह गई, जिसने आज अपनी हक़ीक़त के आईने से एक और आशिक़’ को रुख़सत कर दिया था। दिल्ली की वो पुरानी हवेली आज फ़िर अपनी ख़ामोशी में एक नया दर्द समेटे खड़ी थी, और फिज़ाओं में बस एक ही सवाल रक्स कर रहा था कि क्या वाक़ई इंसान आज भी सिर्फ़ ‘मिट्टी के काल्पनिक सुंदर दिखने वाले बुतों’ का पुजारी है, रूह का नहीं?
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
