ईरान युद्ध में मुस्लिम देशों का साथ न मिलना : कहाँ गया ‘मुस्लिम भाईचारा’?
हाल के समय में ईरान से जुड़े युद्ध और क्षेत्रीय तनाव ने एक बार फिर एक पुराने लेकिन जटिल प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है—यदि दुनिया में लगभग 1.9 अरब मुस्लिम आबादी है और दर्जनों मुस्लिम देश मौजूद हैं, तो फिर संकट के समय वे एकजुट क्यों नहीं दिखाई देते? विशेष रूप से ईरान के संदर्भ में यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि जब वह खुद को इस्लामी पहचान के आधार पर प्रस्तुत करता है, तब अन्य मुस्लिम देश उसके समर्थन में खुलकर क्यों नहीं आते। यह सवाल भावनात्मक स्तर पर जितना सरल प्रतीत होता है, वास्तविकता में उतना ही जटिल और बहुआयामी है। दरअसल, यह पूरी बहस हमें यह समझने का अवसर देती है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में धर्म से अधिक महत्वपूर्ण तत्व राष्ट्रहित, सुरक्षा, आर्थिक स्वार्थ और भू-राजनीतिक समीकरण होते हैं।
ताजा घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में अधिकांश मुस्लिम देश प्रत्यक्ष रूप से उसके पक्ष में खड़े नहीं हुए हैं, बल्कि कई देश मध्यस्थता की भूमिका निभाने या तटस्थ रहने का प्रयास कर रहे हैं। यही स्थिति इस धारणा को चुनौती देती है कि धार्मिक समानता स्वतः राजनीतिक एकता में बदल जाती है। वास्तव में, अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मूल सिद्धांत यह है कि राष्ट्र अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं, न कि केवल सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान के आधार पर।
सबसे पहला और प्रमुख कारण है सुन्नी–शिया विभाजन। इस्लाम के भीतर यह धार्मिक और ऐतिहासिक विभाजन केवल धार्मिक मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई देशों की राजनीतिक और रणनीतिक सोच को भी प्रभावित करता है। ईरान स्वयं को शिया इस्लाम का प्रमुख केंद्र मानता है, जबकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और अधिकांश अरब देश सुन्नी परंपरा से जुड़े हैं। यह विभाजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि कई सुन्नी देश ईरान को केवल एक ‘मुस्लिम देश’ के रूप में नहीं, बल्कि एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण है भू-राजनीतिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा। आज की दुनिया में कोई भी देश केवल भावनात्मक या धार्मिक आधार पर अपने रणनीतिक निर्णय नहीं लेता। खाड़ी क्षेत्र के कई मुस्लिम देश अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सुरक्षा समझौतों में बंधे हुए हैं। उनके यहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं और उनकी अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार, विशेष रूप से तेल निर्यात, पर निर्भर है। ऐसे में यदि वे ईरान के पक्ष में खुलकर खड़े होते हैं, तो इससे उनकी अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि वे सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखते हैं।
तीसरा कारण है ईरान की क्षेत्रीय नीतियाँ और उसकी छवि। कई देशों में यह धारणा बनी हुई है कि ईरान विभिन्न गैर-राज्य समूहों और सशस्त्र संगठनों का समर्थन करता है, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ती है। चाहे वह लेबनान में हिज़्बुल्लाह हो, यमन में हूती विद्रोही हों या इराक और सीरिया के विभिन्न गुट—इन सबके साथ ईरान के संबंधों ने कई मुस्लिम देशों के बीच अविश्वास पैदा किया है। परिणामस्वरूप, वे ईरान के साथ खुलकर खड़े होने से बचते हैं।
चौथा कारण है आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा। खाड़ी क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्था तेल और गैस पर आधारित है, और उनका वैश्विक व्यापार मार्गों से गहरा संबंध है। हाल ही में होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे कई देशों की चिंता बढ़ गई है। ऐसे में वे किसी भी पक्ष का समर्थन करने के बजाय स्थिरता बनाए रखने की कोशिश करते हैं, क्योंकि युद्ध की स्थिति उनके आर्थिक हितों को सीधे प्रभावित कर सकती है।
पाँचवाँ कारण है आंतरिक राजनीतिक और सामाजिक दबाव। कई मुस्लिम देशों के भीतर भी जनता और सरकार की सोच में अंतर होता है। आम जनता भावनात्मक रूप से ईरान या किसी अन्य मुस्लिम देश के प्रति सहानुभूति रख सकती है, लेकिन सरकारें व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाती हैं। कुछ देशों में तो ईरान की नीतियों के कारण आंतरिक सुरक्षा की चिंताएँ भी उत्पन्न होती रही हैं, जिसके कारण वे उससे दूरी बनाए रखते हैं।
छठा और अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है इस्लामी एकता की अवधारणा का मिथक। यह मान लेना कि सभी मुस्लिम देश एकजुट होकर कार्य करेंगे, एक आदर्शवादी धारणा है, जो वास्तविक राजनीति से मेल नहीं खाती। इतिहास गवाह है कि मुस्लिम देशों के बीच भी अनेक युद्ध और संघर्ष हुए हैं—चाहे वह ईरान–इराक युद्ध हो या खाड़ी देशों के आपसी विवाद। इससे स्पष्ट होता है कि ‘मुस्लिम भाईचारा’ एक सांस्कृतिक और भावनात्मक अवधारणा तो हो सकती है, परंतु वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का निर्णायक आधार नहीं बन पाती।
सातवाँ कारण है वैश्विक शक्ति संतुलन और कूटनीति। वर्तमान समय में कई मुस्लिम देश स्वयं को किसी एक ध्रुव के साथ पूरी तरह जोड़ने के बजाय बहुध्रुवीय कूटनीति अपनाना चाहते हैं। वे अमेरिका, चीन, रूस और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहते हैं। इस दृष्टि से ईरान के साथ खुलकर खड़ा होना उनके लिए जोखिम भरा कदम हो सकता है।
आठवाँ पहलू यह भी है कि कई देश मध्यस्थ की भूमिका निभाना चाहते हैं, पक्षकार की नहीं। हाल के घटनाक्रम में तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान जैसे देशों ने संघर्ष को समाप्त करने के लिए मध्यस्थता की कोशिश की है। इसका अर्थ यह है कि वे संघर्ष को बढ़ाने के बजाय शांति स्थापित करने की दिशा में काम करना चाहते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
नौवाँ कारण है ईरान की अपनी रणनीति और कूटनीतिक अलगाव। कुछ विश्लेषण यह भी बताते हैं कि ईरान की पश्चिम विरोधी नीतियों और लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों के कारण वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत अलग-थलग पड़ा हुआ है। इस अलगाव का प्रभाव उसके पारंपरिक मित्र देशों पर भी पड़ता है, जो खुलकर उसका समर्थन करने से हिचकते हैं।
दसवाँ और अंतिम, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कारण है राष्ट्रवाद का उदय। आधुनिक विश्व में राष्ट्रवाद (नेशनलिज़्म) ने धार्मिक एकता की अवधारणा को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है। आज प्रत्येक देश अपनी पहचान, संप्रभुता और हितों को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि समान धर्म होने के बावजूद देश एक-दूसरे के साथ खड़े होने के बजाय अपने-अपने हितों के अनुसार निर्णय लेते हैं।
इस पूरी स्थिति से एक गहरा निष्कर्ष निकलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में धर्म एक महत्वपूर्ण पहचान तो हो सकता है, लेकिन वह निर्णय लेने का अंतिम आधार नहीं होता। शक्ति, सुरक्षा, आर्थिक हित और रणनीतिक समीकरण ही वास्तविक निर्धारक होते हैं। इसलिए यह प्रश्न कि “कहाँ गया मुस्लिम भाईचारा” वास्तव में एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसा भाईचारा कभी भी राजनीतिक स्तर पर पूरी तरह अस्तित्व में था ही नहीं।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि वैश्विक व्यवस्था में एकता की अपेक्षा करना सरल है, परंतु उसे व्यवहार में लाना अत्यंत कठिन है। ईरान का उदाहरण यह दिखाता है कि साझा धार्मिक पहचान भी तब कमजोर पड़ जाती है जब राष्ट्रों के हित आपस में टकराते हैं। यह केवल मुस्लिम दुनिया की कहानी नहीं है; यही स्थिति अन्य धर्मों और क्षेत्रों में भी देखी जा सकती है। इसलिए इस बहस को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय हमें इसे व्यापक भू-राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भ में समझना होगा। तभी हम इस जटिल प्रश्न का यथार्थपरक उत्तर प्राप्त कर सकेंगे।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
