कविता

युद्ध

युद्ध
आदमी -आदमी के बीच का खून संघर्ष है
युद्ध की आग
इंसानियत को जलाकर राख कर देती है
तीर -कमान, लाठी डंडों,
बंदूक की गोली वाला दौर तो चला गया
अब युद्ध मिसाइलों से लड़ा जाता है
जो इतना हाहाकारी है कि
पल भर में मानवता का अंत कर देता है ।

युद्ध आंसुओं के सागर को जन्म देता है
जो सदियों तक उफनता रहता है
विनाश का चलचित्र दिखाता रहता है
स्वार्थ की आग शहर के शहर खा जाती है
मौत की सौदागरी, ए मानव ! अच्छी नहीं…
ये दुनिया शांति से ही सुंदर लगती है
युद्ध किसी समस्या का हल नहीं !

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111