संस्मरण – वो बारह साल की लड़की
वो मेरे पिता के दोस्त थे, बहुत बड़े किसान और साहूकार। उनका नाम सुखदेव सिंह था। बहुत ही बड़ी हवेली। मुझे तो बस खुला आँगन ही याद है, क्योंकि मैं तब मात्र साढ़े चार साल की ही थी। जब मेरी माँ वहाँ जाती तो मैं उस बड़े आँगन में खेलती रहती। बाहर आँगन में एक बड़े से पेड़ के नीचे खाट पड़ी होती। उस घर में गुरूग्रन्थ साहब का पाठ होता तब हम जरूर जाते थे। पूरी हवेली में खूब सारे कमरे थे, एक तरफ गुरुद्वारा था, जानवरों के कमरे और भी पता नहीं क्या क्या था पर दरवाजा सिर्फ एक था और चारों तरफ दीवार जो बहुत ऊँची थी। उन दिनों कभी जब पिता जी देर से आते तो उनके पास कोई कहानी जरूर होती। देर होने पर मैं कहानी सुनने के लिए जागती और माँ चिंता में बस रब्बा सुख रखीं कहती रहती।
उस दिन भी पिता जी बहुत देर से आए थे। खाना खाते हुए माँ ने उनसे देर से आने का कारण पूछा तो वे बोले, “सुखदेव के घर से आ रहा हूँ।”
“पाठ रखा है क्या”?
“नहीं, पर कुड़ी ने तो कमाल कर दिया आज।” फिर उन्होंने जो बात सुनाई, उसे सुनाते हुए वे बहुत खुश थे। अभी शायद दो तीन महीने पहले
उस घर की इकलौती बेटी का जन्मदिन था। गुरु ग्रन्थ साहब के पाठ में हम सब गये थे पर आज जो कहानी पिताजी ने सुनाई, उसे सुनाते समय वे बहुत खुश थे। वह कहानी बाद में भी मेरी माँ बड़े गर्व से सहेलियों को सुनाया करती थी। मेरे पिताजी जनसंघ में थे। तो कहानी कुछ इस तरह से थी।
“दो मंजिल की इस हवेली का बाहर का एक ही दरवाजा था। भीतर नीमछती में (आधी छत) एक गुम कमरा था जिसका पता किसी भी बच्चे को बारह साल का होने के बाद ही दिया जाता था। पूरा घर छान लेने पर भी कोई उस कमरे तक नहीं पहुँच सकता था। उस गुम कमरे में एक ताक से बाहर के दरवाजे पर निशाना साधा जा सकता था। यह गुप्त भेद उस घर की बेटी को इस जन्मदिन पर बताया गया था। खैर
हुआ यूँ कि उसकी माँ कुछ दिन से मायके गई हुई थी, जो ज्यादा दूर नहीं था। उस दिन सुखदेव ने बेटी से पूछा, “मैं तेरी माँ को ले आऊँ, डरेगी तो नहीं? शाम तक हम आ जायेंगे।”
“ठीक है, जाओ।”
“तेरे पास अब्दुला है। खयाल रखेगा।”
“ठीक है।” लड़की ने कहा तो सुखदेव नौकर को घर और लड़की की जिम्मेदारी बारे समझा कर चला गया।
थोड़ी देर बाद अब्दुला भी काम खतम करके अपने घर चला गया तो लड़की ने बड़ा दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया। पर थोड़ी ही देर बाद कुण्डा खड़कने लगा। कौन है पूछने पर पहले तो कोई नहीं बोला, पर बार बार पूछने पर अब्दुल ने जवाब दिया, “मैं हूँ।”
नौकर की आवाज़ पहचान कर लड़की ने दरवाजा खोला तो उसके साथ पूरी फौज देखकर वह घबरा गई। पर दरवाजा तो खुल चुका था, वे सब के सब अन्दर आ गये और उन्होंने दरवाजा फिर से बंद कर दिया।
लड़की को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, तभी आने वालों में से एक ने कहा, जोर की भूख लगी है कुड़ी (लड़की) मक्की की रोटियाँ बना दे। घर में मक्खन तो होगा ही और शक्कर भी, बस हम शक्कर से खा लेंगे। लड़की चुपचाप रसोई में जाकर रोटियाँ बनाने लगी। वे संख्या में 13 थे। लड़की रोटी बनाती रही और वे खाते रहे। कोई चारा नहीं था। रोटी खा चुकने के बाद एक ने कहा, “अब बीबी राणी, घर और ट्रंकों की चाबियाँ दे दे और चुपचाप अन्दर जाकर सो जा। तुझे हम कुछ नहीं कहेंगे।”
लड़की ने चुपचाप सारी चाबियाँ उन्हें दे दीं और कमरे का दरवाजा बन्द कर लिया। शायद वह रोटी बनाते हुए तय कर चुकी थी कि उसे क्या करना है।
थोड़ी देर बाद वे सभी घर के कीमती सामान की गठरियाँ सिर पर लादे दरवाजे की तरफ बढ़ रहे थे। नगठरी सिर पर रखे एक ने दरवाजा खोलने के लिए कुण्डी को हाथ ही लगाया था कि कहीं से एक गोली आई और उसकी पीठ से सीधे सीने में उतर गई। वह एक तरफ जा गिरा। बाकी सब इधर उधर देखने लगे कि गोली कहाँ से आई है। जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो दूसरा दरवाजे तक पहुँच गया पर उसका भी वही हाल हुआ। अब उन लोगों ने गठरियाँ एक तरफ रखकर पूरी हवेली छान डाली पर वे गोली चलाने वाले को नहीं खोज सके। फिर एक और, फिर एक और। इस तरह जो भी लुटेरा दरवाजे तक पहुँच जाता ढेर कर दिया जाता। बारी बारी नौ लुटेरे हूरों के पास पहुँच गये। बचे चार दीवार से चिपके खड़े थे।
अब तक गोलियों की आवाज़ से मुहल्ला गली में इकट्ठा हो चुका था। पुलिस भी आ चुकी थी पर गोली चलने की दिशा किसी की समझ में नहीं आई। अब तक सुखदेव भी पत्नी को लेकर आ चुका था। आखिरी गोली की आवाज़ उसने सुनी थी। पुलिस इंसपेक्टर दरवाजा तोड़ने की योजना बना रहा था कि सुखदेव ने उन्हें मना किया और दीवार पर चढ़कर भीतर कूद गया, कोई गोली नहीं चली। उसने हवेली का दरवाजा खोल दिया। दीवार से चिपके चार लुटेरे पकड़ लिये गये। अब सुखदेव सिंह ने चोर कमरे का दरवाजा खुलवाया तो लड़की उसकी दोनाली बंदूक लिए सामने खड़ी थी।
हाँ, पिताजी ने यह भी बताया था कि इंस्पेक्टर ने अपने गले से गोलियों की माला उतारकर लड़की को पहना दी थी। माँ -बाप को देखकर लड़की फूट फूटकर रो उठी। उसने रोते रोते सारी घटना बताई।
— आशा शैली
