हास्य-व्यंग्य – हाय रे सफेदपोश
नेता सज्जन होते हैं। साफ-सुथरे होते हैं। दाग धब्बा नहीं लगा होता है। सादगी पसंद है। सादगी के बगैर रह नहीं सकते हैं। सफेद वस्त्र भी धारण करते हैं। सफेदी से गहरा लगाव होता है। यही वजह होता है कि नेताजी को सफेदपोश की संज्ञा दी गयी है। यह सबके संज्ञान में भी है।
उनकी ईमानदारी पर अंगुली उठ नहीं सकती है। ईमानदार प्रवृत्ति के होते हैं। इसके साथ ही बहुत मृदुभाषी होते हैं। चुनाव आते ही गली-गली में घर-घर, द्वार- द्वार नजर आते हैं। इनकी सादगी पर आप मर मिटेंगे। तन-मन सहित सब कुछ आम जनता न्यौछावर कर देगी। इनका भोलापन तथा सादगी के वस्त्रों से सब निढाल हो जाते हैं।
कोई इनके चरित्र पर अंगुली नहीं उठा सकता है। कोई तो सपने में भी नहीं सोंच सकता है कि ये महाठग हैं। आखिर इनका चोंगा ही सफेद होता है। वही एकदम मासूम सा चेहरा, गोल-गोल आंखें, नरम-नरम हाथ। इनके बाल भी सादगी भरे होते हैं।
पूरा भरोसा हो जाता है कि यही उत्तम प्रकृति के सफेदपोश साहब हमारा दुख हरन करेंगे। सुख बटोरकर लायेंगे और पूरी थैली में भरकर खूंटी में टांग देंगे ताकि जिसको जब भी जरूरत महसूस हो। थैली में से लेकर सुख का आनन्द ले सकते है।
अगले दिन समाचार पत्र में खबर छपी कि सफेदपोश के उपर सैकड़ों केस दर्ज हैं। मारपीट, दंगाफसाद, लूटपाट, हत्या, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार,जबरन वसूली, अवैध कारोबार, किसी का जमीन हडपने आदि का मामला सुनकर रोम-रोम कांप उठा।
ऐसी सादगी सफेदपोश को देखकर लोकतंत्र से भरोसा उठ गया। हाय रे सफेदपोश। हम सब का वोट लेकर रफूचक्कर हो जायेगा। पांच साल तक पेंडुलम की तरह इधर-उधर झूलना पड़ेगा। फिर अगली बार कोई और सफेदपोश आयेगा। वह उससे भी नरम दिखेगा। यही प्रक्रिया चलती रहेगी।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
