प्रेम प्रतीक्षा
प्रेम प्रतीक्षा सघन वन संकेत संकल्प थे,
अश्रु मेघ धार बनकर बरसते चले गए।
ऋतु वर्णन कैसे किस हाल में सुनाऊं तुम्हें,
हम तो पतझड़ जैसे बिखरते चले गए।।
स्वरों की महफ़िल ढूंढने निकले थे,
पर शब्दों के अधूरे अनुस्वार रह गए।
पल पल ढूंढते चले थे राहों में जिन्हें ,
हर पल प्रश्नवाचक बन कर रह गए।।
कभी फूलों से बात करते निकले,
कभी परिंदों से राह पूछते चले गए।
खबर न मिली थी कभी हमारी उन्हें,
हम फिर भी गीत ग़ज़ल गाते चले गए।।
पवन से महकती खुशबू महसूस करते थे,
हम उसे इत्र की महक समझते चले गए।
हमारी वर्णमाला की सारणी पता नहीं उन्हें,
वो हमें अधूरी गज़ल समझकर कर चले गए।।
व्यंजनो की मधुर माला गूंथते हम रह गए,
स्वरों से विरह वेदना के स्पंदन पूछते गए।
कौन सुनाएगा रस छंद दोहे अलंकार उन्हें,
हम अल्प विराम से अधूरे संकेत रह गए।।
— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”
