धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

इस्लाम : जो पहले हराम था, अब हलाल है

  1. रेलगाड़ी- जब ये आई तो मौलानाओ ने फरमाया कि हमारे नबी ने दुनिया के सर्वनाश की एक निशानी यह बताई थी कि जब लोहा लोहे पर चलेगा तो कयामत आएगी लेकिन आज माशा-अल्लाह उलेमा इसी लोहे के बर्थ पर नमाज़ें अदा करते नजर आते हैं।
  2. लाउडस्पीकर -जब ये आया तो उसकी आवाज़ को गधे की आवाज़ से तुलना कर उसे शैतानी यंत्र करार दे दिया गया लेकिन आज हर मस्जिद और आलिम मजलिस में सुवरचिघ्घाड़ के लिए ये जरूरी है।
  3. हवाई जहाज- जब इसकी चर्चा आम हुई तो उलेमाओं ने कहा कि जो इस लोहे में उड़ेगा, उसका निकाह खत्म हो जाएगा लेकिन जाहिर है कि आज अल्हमदुलिल्लाह इसी लोहे पर उड़ कर मुसलमान हज व उमरा की नेकियां बटोर रहे हैं।
  4. मुर्गी- इनपर भी फतवे लगे ऐसी घरेलू मुर्गी जो बाहर से दाना चुग कर आई हो उसे हलाल नहीं किया जा सकता पहले उसे तीस दिनों तक दड़वे में रखा जाए फिर हलाल किया जाए।
  5. पोल्ट्री फार्म- जब इसकी मुर्गी आई थी तो उसके अंडों पर फतवा लगा क्योंकि उन अंडों का कोई #बाप नहीं था।
  6. प्रिंटिंग प्रेस- युरोप में जब प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हुआ तो उसे इस्लाम में हराम करार दे दिया गया क्योंकि उससे पहले मुस्लिम उलेमा वज़ू करके कुरान व हदीस की किताबों को हाथों से लिखते थे। उलेमाओं का मानना था कि ये नापाक मशीन है जिस पर अल्लाह और रसूल का कलाम छापना हराम है लेकिन अब ये पूरी तरह हलाल हो गई है।
  7. अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति- अंग्रेजों ने जब नई चिकित्सा पद्धति अपनाया तो टीके पर भी फतवा लगा उसपर ऐसी लम्बी लम्बी बहसें हुईं कि अगर उन्हें एक जगह जमा करके पढ़ा जाए तो आदमी हंसते हंसते लोट पोट हो जाए।
  8. रक्तदान- इसको भी इस्लाम मे हराम कर दिया गया इनके अनुसार रक्तदान करना हराम है पर अपने जिस्म पर किसी और का खून चढ़वाना हराम नही है। लेकिन आज देश में ऐसा कौन सा अस्पताल है जहांँ ये सहूलियत मौजूद न हो, अब तो रक्तदान नेकी का काम है। हाँ, यह अवश्य है कि अब भी कोई मुस्लिम रक्तदान नहीं कर रहा है, केवल दूसरों का खून ले रहा है…!!
  9. फोटो सेल्फी- फोटो खिंचाना हराम है लेकिन आज कौन सा ऐसा मुसलमान है जो इससे इनकार करता हो सऊदी अरब जैसा कट्टर मुस्लिम देश भी नहीं करता।
  10. टेलीविजन- टीवी को हराम ही नहीं बल्कि उसे शैतानी डिब्बा कहा गया. जमाअतुत दावा के एक मासिक पत्रिका में उसके खिलाफ लगातार लेख छपते रहे लेकिन आज उसी के बड़े रहनुमा इसी शैतानी डिब्बा में अपनी ईमान से भरी तकरीर से उम्मत को नवाजते रहते है और भी बड़े बड़े उलेमा तो ज्यादा समय इसी डिब्बे में गुजारते हैं।

सवाल ये है कि ये टिड्डी दल के सरदार मौलाना किनके इशारे पर अपने इरादों और फतवों में बदलाव करते है? पहले हराम फिर उसी में आराम? सबकुछ बदल जाएगा पर 1400 पुरानी वहशी सोच नही बदल सकती।।

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