इतिहास

चुलबुली और शोख सुरों की मलिका आशा ताई अब ‌सिर्फ गीतों में मिलेगीं – गोपेंद्र

भारत के प्रख्यात पार्श्वगायिका आशा भोंसले का रविवार 12 अप्रैल 2026 को मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की आयु में कार्डियक अरेस्ट के कारण अंतिम सांस लीं।
संगीत के संसार से एक ऐसी खनकती हुई आवाज़ हमें अलविदा कह गई, जिसने 7 दशकों तक करोड़ों दिलों की धड़कनों को अपने साथ थिरकने को मजबूर कर दिया। उनकी काया भले ही अब हम लोगों के सामने नहीं रहेगा लेकिन सुर युग- युगांतर तक भारत भूमि के फिजाओं में मधुर रस घोलती रहेगी।

आशा भोंसले का देहावसान केवल एक गायिका का जाना नहीं, बल्कि भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है। उन्होंनेने अपने लम्बे करियर में 12,000 से ज्यादा गीतों में अपनी आवाज दी। उनके हज़ारों गीत आज भी लोकप्रिय हैं ! संगीतकार ओ पी नैय्यर के लगभग सारे गीत आशा भोंसले ने ही गाये।
उनका जन्म 8 सितम्बर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। छोटी उम्र से ही उन्होंने गाना शुरू कर दिया था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर भी बड़े संगीतकार थे।लता मंगेशकर उनकी बड़ी बहन थीं।
10 साल की छोटी उम्र में ही उन्होने मराठी फिल्म ‘माझा बाळ’ के लिए पार्श्वगायन किया था। हिन्दी फिल्मों में उनकी गायकी के सफ़र शुरूआत फिल्म चुनरिया से हुई थी। 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया जबकि 2000 में दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मनित की गयी थीं।आशा जी की आवाज़ में वह दुर्लभ लचीलापन था, जो शास्त्रीय बंदिशों से लेकर चंचल कैबरे और रूहानी ग़ज़लों तक को समान अधिकार से जीता था।

साबित किया उम्र महज़ एक संख्या है

उन्होंने साबित किया था कि उम्र महज़ एक संख्या है, उनकी ऊर्जा और प्रयोगधर्मिता अंतिम समय तक युवाओं को प्रेरित करती रहीं।
एक समय में जहां लता जी की आवाज क्लासिकल या गंभीर गीतों के लिए जानी जाती थी तो आशा जी की आवाज का इस्तेमाल संगीतकार चुलबुलेपन और गानों में एक मस्ती भरी कशिश के लिए करते थे।
आशा जी के गाए कुछ गाने कभी भुलाए नहीं जा सकते।जैसे –
“दम मारो दम”, “पिया तू अब तो आजा”, “चुरा लिया है तुमने जो दिल को”, “इन आंखों की मस्ती”, “आओ हुजूर तुमको”, “कजरा मोहब्बत वाला”, “ये मेरा दिल यार का दीवाना”, “मेरा कुछ सामान”आदि।

संघर्ष से शुरूआत

जब वे महज 9 वर्ष की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था। उन्होंने केवल दस साल की उम्र में ही भाई-बहनों के परवरिश हेतु गाना शुरू कर दिया था।16 साल की उम्र में उन्होंने परिवार की मर्जी के खिलाफ बहन लता मंगेशकर के निजी सचिव 31 वर्षीय गणपत राव से भागकर शादी कर ली। लता ने उनसे बात करना बंद कर दिया। परिवार ने उन्हें त्याग दिया। शादी सफल नहीं हुई और टूट गई।वे दो बच्चों के साथ वापस आईं और तीसरे बच्चे के साथ गर्भवती थीं।कोई पैसा नहीं। कोई सहारा नहीं। तीन बच्चों को खिलाना था।वे फिर से गाने लगीं।

1950 के दशक में उन्हें केवल वे गाने मिले जो लता, गीता दत्त और शमशाद बेगम ने ठुकरा दिए थे। वैंप के गाने। कैबरे नंबर। सी-ग्रेड फिल्में।उन्होंने हर एक गाया। क्योंकि उनके बच्चों को खाना चाहिए था।फिर ओ.पी. नैय्यर आए।

दूसरी शादी आरडी बर्मन के साथ जिनका आजीवन साथ निभाया।
1980 ई. में आशा जी ने सचिन देव बर्मन के बेटे ‘राहुल देव बर्मन’ (पंचम दा) से विवाह किया। जिसे आशा ताई ने राहुल देव वर्मन के अंतिम सांसो तक सफलतापूर्वक निभाया। आरडी बर्मन आशा ताई के जीवन में नई किरण बनकर आए और फिर उनकी दुनिया तेजी से बदलने लगी।दम मारो दम,पिया तू अब तो आजा, चुरा लिया है तुमने…
उन्होंने इन गानों को सिर्फ नहीं गाया। वे खुद उन गानों में बदल गईं।1995 में 62 साल की उम्र में उन्होंने रंगीला रे गाया और उस पूरी पीढ़ी को चुप करा दिया जिसने उन्हें असफल लिख दिया था।2011 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने पुष्टि की जो भारत पहले से जानता था।

संगीत इतिहास में सबसे ज्यादा रिकॉर्डिंग करने वाली कलाकार

12000 गाने। 20 भाषाएं। 8 दशक। शुरू में वे वैसे गाने गाती थीं जो नामचीन गायक- गायिका गाने से इंकार कर देते थे। शुरुआत में जिसे, कोई अपने गानों के लिए लेना नहीं चाहता था, वह लड़की कई पीढ़ी की आवाज बन गई।अब इस जहां में कोई दूसरी आशा भोंसले कभी नहीं होगी।

सम्मान एवं विशेष पहचान

1997 मई आशा ताई पहली भारतीय गायिका बनी जो ‘ग्रेमी अवार्ड के लिए नामांकित की गईं (उस्ताद अली अकबर खान के साथ एक विशेष एलबम के लिए)
आशा ताई “सत्तरहवी महाराष्ट्र स्टेट अवार्ड” प्राप्त कीं।
भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए सन 2000 में “दादा साहेब फाल्के अवार्ड” से सम्मानित की गईं।
उन्हें साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि से अमरावती विश्वविद्यालय एवं जलगाँव विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित किया गया।
“द फ्रिडी मरकरी अवार्ड” कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए आशा ताई को इस खास पुरस्कार से सममानित किया गया।
नवम्बर 2002 में आशा जी को “बर्मिंघम फिल्म फेस्टिवल” विशेष रूप से समर्पित किया गया।
“पद्मविभूषण” के द्वारा राष्टपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 5 मई 2008 को आशा ताई को सम्मानित किया। यह सम्मान भारत सरकार के महत्वपूर्ण सम्मानो में है।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

1981- “दिल चीज क्या है।..”(उमरॉव जान)
1986 “मेरा कुछ सामान…”(इजाजत)

मराठी संगीत

लता मंगेसकर के साथ आशा ताई मराठी संगीत की सिरमौर रही हैं। (क्योंकि मराठी उनकी मातृभाषा थी)। आशा भोसले ने मराठी भाषा की अनेको गीत गाईं, जिनमे प्रसिद्ध कविओं की कविताएं भी शामिल थी, जो भाव गीत के रूप में प्रसिद्ध हैं। यथा प्रसिद्ध एलबन ‘रूतु हिरावा’(‘ग्रीन सीजन’) जो श्रीधर पाडके द्वारा रचित है। अपने भाई हृदयनाथ मंगेसकर द्वारा संगीतबद्ध आशा जी के कई प्रसिद्ध गीत है। आशा ताई द्वारा गाए मराठी भजन काफी प्रचलित और प्रसिद्ध है।

फिल्म जो मिल का पत्थर साबित हुई

आशा ताई के गायिकी के कैरियर में चार फिल्मे मिल का पत्थर, साबित हुई— नया दौर (1957), तीसरी मंजिल (1966), उमरॉव जान (1981) और रंगीला (1995)। नया दौर (1957):— आशा भोसले जी की पहली बड़ी सफल फिल्म बी. आर. चोपड़ा की ‘नया दौर’(1957) थी। मो. रफी के साथ गाए उनके गीत यथा ‘माँग के हाथ तुम्हारा….’, ‘साथी हाथ बढ़ाना…’ और ‘उड़े जब जब जुल्फे तेरी…’ शाहिओ. पी. नैयर द्वरा संगीतबद्ध एक खास पहचान दी। आशा जी ने ओ.पी. नैयर के साथ पहले भी काम किया था पर यह पहली फिल्म थी जिसके सारे गीत आशा जी प्रमुख अभिनेत्री के लिए गाई थी। प्रोड्यूसर बी. आर. चोपडा ने नया दौर में उनकी प्रतिभा की पहचान कर आने वाली बाद की फिल्मों में पुन: मौका दिया। उनमे प्रमुख फिल्म— वक्त, गुमराह, हमराज, आदमी और इंसान और धुंध आदि है। तीसरी मंजिल (1966):- आशा भोसले ने राहुल देव वर्मन की ‘तीसरी मंजिल’(1966) से काफी प्रसिद्ध हुई। जब पहले उन्होने गाने की धुन सुनी तो गीत ‘आजा आजा…’ इस गीत को गाने से इनकार कर दिया था, जो वेस्टर्न डांस नम्बर पर आधारित थी। तब आर. डी. वर्मन ने संगीत को बदलने का प्रस्ताव आशा जी को दिया किंतु आशा जी ने यह चैलेंज स्वीकार करते हुए गीत गाए। 10 दिन के अभ्यास के बाद जब अंतिम तौर पर यह खास गीत आशा जी ने गाए तो खुशी के कायल आर. डी. वर्मन ने 100 रूपये के नोट आशा जी के हाथ में रख दिए। आजा आजा…. और इस फिल्म के अन्य गीत – ओ हसीना जुल्फो वाली… और ओ मेरे सोना रे…. ये सभी गीत रफी जी के साथ तहलका मचा दिया। शम्मी कपूर इस फिल्म के नायक ने एक बार कहा था “यदि में पास मो. रफी इस फिल्म के गीतो को गाने के लिए नहीं होते तो मै आशा भोसले को यह कार्य देता”। उमराव जान (1981):- रेखा अभिनित ‘उमराव जान’(1981) आशा जी ने गज़ल गाया यथा- दिल चीज क्या है।…, इन आँखों की मस्ती के…, ये क्या जगह है दोस्तों… और जुस्त जु जिसकी थी।..। इन गज़लों के संगीतकार खय्याम थे जिन्होने आशा जी से सफलतापूर्वक गज़लो को गाने के लिए स्वरों के उतार चढाव को समझाया। आशा जी स्वयं आश्चर्यचकित थी कि वह इन गज़लो को सफलतापूर्वक गाई है। इन गज़लों ने आशा जी को प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया और उनकी बहुमुखी प्रतिभा साबित हुई। रंगीला (1995):- सन 1995 में 62 वर्षीय आशा जी ने युवा अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर के लिए फिल्म रंगीला में गाई। इन्होंने फिर अपने चाहनेवालों को आश्चर्यचकित कर दिया। सुपर हिट गीत यथा- तन्हा तन्हा… और रंगीला रे… गीत ए. आर. रहमान के संगीत निर्देशन में गाई जो काफी प्रसिद्ध हुआ। बाद में कई अन्य गीतों को ए. आर. रहमान के निर्देशन में गाई। तन्हा तन्हा… गीत काफी प्रसिद्ध हुआ और आज भी लोग गुनगुनाते हैं।दक्षिण एशिया की प्रसिद्ध गायिका के रूप में आशा जी ने गीत गाए।

गायकी के हर क्षेत्र में हाथ आजमाया

फिल्म संगीत, पॉप, गज़ल, भजन, भारतीय शास्त्रीय संगीत, क्षेत्रीय गीत, कव्वाली, रवीन्द्र संगीत और नजरूल गीत इनके गीतों में सम्मिलित है।

14 से ज्यादा भाषाओं में गाए गीत

उन्होंने चौदह से ज्यादा भाषाओं में गीत गाए यथा– मराठी, आसामी, हिन्दी, उर्दू, तेलगू, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, अंग्रेजी, रशियन, जाइच, नेपाली, मलय और मलयालम।महान गायक किशोर कुमार आशा जी के सबसे मनपसंद गायक थे।
अब सिर्फ गीतों में मिलेगी आशा ताई। विनम्र श्रद्धांजलि।

— गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम

गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम

शिक्षक और सामाजिक चिंतक देवदत्तपुर पोस्ट एकौनी दाऊदनगर औरंगाबाद बिहार पिन 824113 मो 9507341433

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