कविता

मुस्कुराता बचपन

बच्चों को खुलकर खिलखिलाने दो,
उनमें “आनंद” भाव जमकर रमने दो,
दौड़ता-कूदता, उछलता-खेलता,
मुस्कुराता बचपन अच्छा लगता है ।

बारिश की बूॅंदों संग छप-छप,
दोस्तों संग लंबी-लंबी गपशप,
नाचता-भीगता, खाता-बतीयाता,
मुस्कुराता बचपन अच्छा लगता है ।

रूपहलें सपनों की ऊॅंची उडान,
दुनिया की दुनियादारी से अंजान,
सपने गढ़ता-उड़ता, लिखता-पढता,
मुस्कुराता बचपन अच्छा लगता है ।

दादी-नानी की खट्टी-मीठी कहानी,
संस्कारों में सजती संवरती नादानी,
ढलता-पलता, गुनगुनाता-तलाशता,
मुस्कुराता बचपन अच्छा लगता है ।

तन-मन की थकावट हर लेता,
जीवन को खुशियों से भर देता,
चहकता-महकता, रुठता-मनाता,
मुस्कुराता बचपन अच्छा लगता है ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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