दूर का चाँद
हर रोज़ ये चाँद
गगन से उतरकर
मेरी मुंडेर पर आकर
पर्दों में उलझ जाता है।
वो आता है संदेश लिए
किसी के उस विशेष का,
जिसे छूकर लौटा है अभी,
और उस छुवन की सिहरन
उढ़ेल देना चाहता है
हर देह, हर काया पर।
फिर मुस्कुरा उठता है
वो तन्हा सा चाँद,
पूर्ण गगन के बीचों-बीच।
यूँ ही हर रात वो
किसी एक प्रियतम की छुवन
दूसरे प्रिय के हृदय तक
चुपके से पहुँचा देता है।
चाँद, तू अकेला कहाँ
तू तो अनगिन धड़कनों का
मौन साक्षी है,
और हम
दूर खिड़की के उस पार
तुझे निहारते रहते हैं।
यहाँ तक की तेरे बिना
एक पल जीना मुश्किल है
और अमावस में भी
तेरी राह तकते रहते हैं
— सविता सिंह मीरा
