कविता

सड़ा दिमाग

जब से घर में लड़की ने गड़बड़ी मचाई है,
तभी से बूढ़ऊ की बुद्धि पूरी हड़बड़ाई है।

अपना पैसा निकलवाने के फेर में,
कर्जदार के भाई को पकड़ लिया देर में,
बेटे को छोड़, पूत को जकड़ लिया,
अन्याय का एक नया ही रास्ता पकड़ लिया।

सबको पता है वो रोज सुबह आता है,
चाय की चुस्कियों संग तगादा सुनाता है,
हर सुबह कर्जदार को डराता-धमकाता है,
जिंदगी को उसका बोझिल बनाता है।

ले-देकर कर्जदार ने मूल चुका दिया,
पर ब्याज का नया फरमान सुना दिया,
अब वो घुट-घुट कर जीने लगा,
ग़म में डूबकर जहर सा पीने लगा।

तगादों ने उसे इतना परेशान कर दिया,
चिंता ने उसे अस्पताल पहुँचा दिया,
चार दिन की जद्दोजहद के बाद,
वो इस दुनिया से ही निकल गया।

बूढ़ऊ के चेहरे का रंग बदल गया,
पर उसका लालच फिर भी न पिघल गया,
अब उसने नया पैंतरा अपनाया है,
कर्जदार के बदले भाई को सताया है।

मगर वो भूल गया किससे पाला पड़ा है,
अब सब जान गए—दिमाग उसी का सड़ा है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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