श्रमिकों की आवाज़
धुएँ में घुलती चीखें व सड़कों पर बिखरा शोर,
अब मुट्ठियाँ उठी हुई हैं और आँखों में है जोर।
पसीने की हर बूंद से ‘रोटी’ का सपना है जुड़ा,
जब हक़ ही छिन जाए तो ‘गुस्सा’ भी है खड़ा।
जलती लपटों के बीच आवाज़ें ढूँढ रहीं न्याय,
भीड़ में हर ‘चेहरा’ कहता अब ना हो अन्याय।
आँसू गैस के बादल और दिलों में लगती आग,
सड़कें बन गईं गवाह संघर्षों का ये कैसा राग।
शांत होवे यह तूफ़ान मिले सबको अपना हक,
इंसाफ की रोशनी में फिर मुस्कुराए हर शख्स।
अब हजारों श्रमिक कभी सड़कों पर ना उतरे,
वेतन वृद्धि व अन्य मांगों का समाधान निकले।
(संदर्भ – नोएडा में श्रमिकों का आंदोलन)
— संजय एम तराणेकर
