लघुकथा – दलाली चलती रहेगी
जिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा नाम हो रहा था। इनकी गिरहबान में ईमानदारी है। कोई झकझोर नहीं सकता। ईमानदारी की रोटी खाने में भरोसा था। किसी की गाढ़ी कमाई को छीन कर बीबी बच्चों का पेट भरना उनके जीवन के शब्दकोश में नहीं था।
जिले में खुशी की लहर थी। कलावती सबसे खुश थी। बुढ़ापे का पेंशन लग जायेगा। दो रोटी मिल जायेगा। भगवान ऐसे बाबू का भला करे। उसकी रोजी रोटी में और तरक्की हो। लाठी टेकते पहुँच गयी अफसर के आफिस में। बड़ी भीड़ थी। इतनी भीड़ थी कि तीन दिन से मिलने को आ रही है। भीड़ में दो फीट आगे बढ़ने के बदले चार फीट पीछे हो जाती।
बुढ़ी कलावती को देखकर एक दलाल को दया आ गयी। इस भीड़ में शुरू कर दी दलाली। अम्मा अधिकारी तक आपका पैसा नहीं पहुंच पाया इसलिए आप नहीं पहुंच पा रही है। साहब चुपके से लेते हैं। उनके जेब में डाल देने से सब काम हो जाता है।
दलाल ने कुछ पैसे ऐंठकर कलावती का काम करा देता है। पेंशन लग गयी। भले कुछ लगा। पेंशन तो मिलने लगी। एक दिन अफसर कलावती के घर अपनी ईमानदारी का टोह लेने पहुंच गये। पेंशन के बारे में पूछा कि आपका एक पैसा नहीं लगा। पेंशन मिलने लगी।
पूरे एक हजार दिया हूँ। तब पेंशन मिलनी शुरू हुई। अफसर महोदय समझ गये किसी ने मेरे नाम का इस्तेमाल करके पैसा ऐंठकर ले लिया। ईमानदार अफसर ने कलावती का लगा समस्त खर्च वापस कर दिया और भविष्यवाणी की- ‘इस दुनिया से दलाल नहीं खत्म हो सकते। दलाली चलती रहेगी। चाहे जितने ईमानदार अफसर ईमानदारी का चोंगा क्यों न पहन ले।’
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
