गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

है अगर मुमकिन तो साथ दीजिए,
रूठे हैं अगर कोई तो बात कीजिए।

यहाँ हर शख्स बेवजह परेशान सा रहता है,
किसी की थोड़ी परेशानियाँ तो हल कीजिए।

मैं, मेरा, मुझे,यह सिर्फ उलझन ही तो है,
यह जो वहम है उसे कभी मिटा तो दीजिए।

हर कोई यहाँ हर साँस का गुलाम है,
कभी उसे भी एक दरख्त सी छाँव तो दीजिए।

मुझसे बेहतर कोई नहीं है इस जहाँ में,
मेरे कहने से बस एक बार आईना देख लीजिए।

हर कोई यहाँ मगरूर नहीं होता,
कभी तो उसे समझने की कोशिश कीजिए।

यह लेन-देन का दौर बहुत बुरा है “सपना”,
बहुत सोच समझ कर ये सौदा कीजिए।

— सपना परिहार

सपना परिहार

श्रीमती सपना परिहार नागदा (उज्जैन ) मध्य प्रदेश विधा -छंद मुक्त शिक्षा --एम् ए (हिंदी ,समाज शात्र बी एड ) 20 वर्षो से लेखन गीत ,गजल, कविता ,लेख ,कहानियाँ । कई समाचार पत्रों में रचनाओ का प्रकाशन, आकाशवाणी इंदौर से कविताओ का प्रसारण ।

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