कहानी

‘एक्स-हसबैंड’

ज़ोया और राकेश की मुहब्बत के किस्से कभी स्कूल की तंग गलियों और कॉलेज के उन नीम के पेड़ों के नीचे मशहूर थे, जहाँ उन्होंने एक-दूसरे के हाथ थामकर उम्र भर साथ चलने का अहद किया था। ज़ोया के लिए राकेश महज़ उसका शौहर नहीं, उसकी इबादत था। शादी के बाद के कुछ साल किसी मख़मली ख़्वाब की तरह गुज़रे। ज़ोया ने अपनी मुहब्बत और सलीक़े से घर को उस जन्नत में बदल दिया था जिसकी मिसालें दी जाती थीं। उनकी शादी-शुदा ज़िंदगी एक मुकम्मल नज़्म की तरह रवां थी।
मगर वक़्त की गर्दिश ने ख़ामोशी से दस्तक दी। राकेश की ज़िंदगी में रंजना नाम की एक लड़की दाखिल हुई। रंजना की बाहरी चमक-धमक और लच्छेदार बातों ने राकेश के ज़हन पर ऐसा पर्दा डाला कि उसे घर की दीवारें काटने को दौड़ने लगीं। वह जो कभी शाम ढलने से पहले घर पहुँचता था, अब आधी-आधी रात तक ‘ऑफ़िस की मसरूफ़ियत’ और ‘काम के बोझ’ का बहाना बनाकर बाहर रहने लगा। रंजना की तरफ़ उसका मैलान (झुकाव) इस कदर बढ़ा कि उसने अपनी वफ़ादार बीवी की आँखों में तैरते सवालों को पढ़ना ही छोड़ दिया।
एक दोपहर, ज़ोया का सब्र उस वक़्त टूटकर बिख़र गया जब उसने बाज़ार के एक भीड़-भाड़ वाले मोड़ पर राकेश को रंजना के साथ बाइक पर देखा। दोनों के चेहरों पर वो बेफ़िक्री वाली मुस्कुराहट थी जो कभी सिर्फ ज़ोया के लिए वक़्फ़ थी। ज़ोया का वजूद कांप गया, उसकी रूह जैसे सीने के अंदर ही दम तोड़ गई। उसने बहुत ज़ब्त किया, अपनी हालत को संभाला, मगर उस मंज़र ने घर की बुनियादें हिला दी थीं। आख़िरकार, अपनी आबरू और टूटे हुए मान को समेटकर वह ख़ामोशी से अपने मायके चली गई।
महीने गुज़रे और हक़ीक़त का सूरज चढ़ा। रंजना, जिसके लिए राकेश ने अपना आशियाना फ़ूक दिया था, बेवफ़ा निकली। उसने राकेश की मजबूरी और तन्हाई का फ़ायदा उठाया और उसे धोख़े की गहरी खाई में धकेल कर किसी और की राह पकड़ ली। राकेश अब अंदर और बाहर, दोनों तरफ़ से राख़ हो चुका था। उसकी दुनिया उजड़ चुकी थी जिसका गुनहगार कोई और नहीं, वह ख़ुद था।
राकेश की रातें अब काली और बोझिल हो गईं। वह सारी रात जागता, सिगरेट के एक कश से दूसरा कश सुलगाता। कमरे में धुएं के बादल मँडराते रहते और राकेश उन बादलों में ज़ोया का अक्स तलाशता। सिगरेट की तल्ख़ी ने उसके फेफड़ों को छलनी कर दिया था,जब वह खाँसता, तो महसूस होता कि फेफड़ों के टुकड़े बाहर आ जाएँगे। दर्द जब हदों से गुज़रता, तो वह शराब की बोतल का सहारा लेता, मगर नशा भी उसे उसके ज़मीर की अदालत से रिहा न कर पाता। उसमें इतनी जसारत (हिम्मत) भी न थी कि वह ज़ोया के सामने जाकर आँखें मिला सके। वह अपनी ही नज़रों में एक हकीर मुजरिम बन चुका था।
फ़िर एक दिन, मुकद्दर ने उसे एक अजीब मोड़ पर ला खड़ा किया। वह ट्रेन के सफ़र के लिए एक स्टेशन के वेटिंग हॉल में बैठा था। आँखें सूजी हुई, बाल बिखरे हुए और चेहरे पर बरसों की थकान। अचानक उसे लगा जैसे हवा में कोई जानी-पहचानी खुशबू घुली है। उसने नज़र उठाई तो देखा,सामने ज़ोया खड़ी थी। वह आज भी वैसी ही बा-वक़ार और सलीक़ेदार थी। राकेश को लगा कि वह कोई सपना देख रहा है।
ज़ोया ने उसके करीब आकर निहायत संजीदगी से कहा, “कैसे हो राकेश? ये सिगरेट और धुएं की सोहबत कब से इख़्तियार कर ली? रंजना कहाँ है? कैसी है वह? सुना है तुम दोनों ने शादी कर ली है। अच्छा ही हुआ कि तुम्हें मुझसे निजात जो मिल गई, मुझे भी आज़ाद होना ही था क्योंकि तुमसे अब कोई उम्मीद बाक़ी नहीं रही थी। तुम ख़ुश थे, बस मेरी ख़ुशी भी उसी में थी।
उसने अपनी आँखों के कोनों को पोंछते हुए आगे कहा, “मेरा हाल मत पूछना कि वो रातें, वो दिन और वो लम्हें मैंने कैसे काटे जब तुम रंजना के आग़ोश में होते थे। खैर, ये सब अब पुरानी बातें हैं। ये बताओ, कहाँ जा रहे हो?”
राकेश के लब थरथराए, मगर अल्फाज़ जैसे गले में फँस गए। वह अपनी बदहाली और रंजना की बेवफ़ाई की दास्तान सुनाना चाहता था, मगर ज़ोया के चेहरे की चमक ने उसे चुप करा दिया। वह लड़खड़ाकर बस इतना कह पाया, “बस… जा रहा हूँ।”
ज़ोया बोली, “राकेश बताओ तो सही कहाँ जा रहे हो? मैं भी इसी ट्रेन से जा रही हूँ। चलो साथ चलते हैं, मैं भी इस सफ़र में अकेली ही हूँ।”
ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ चुकी थी। राकेश का जिस्म बीमारियों और ग़मों के बोझ से इतना थका हुआ था कि उससे उठते नहीं बन रहा था। ज़ोया ने रहमदिली दिखाई और उसका भारी सूटकेस, जिसमें शायद उसकी नाकामियों का बोझ भरा था, अपने हाथ में ले लिया। उसने सहारा दिया और कहा, “चलो, मैं तुम्हारी मदद कर देती हूँ।” राकेश को लगा जैसे वक़्त लौट आया है, जैसे ज़ोया ने उसे माफ़ कर दिया है और अब सब ठीक हो जाएगा।
ट्रेन की तेज़ रफ़्तार के साथ राकेश के अंदर एक उम्मीद जागने लगी। उसने इधर-उधर की बातें कीं, ज़ोया का हाथ थामने की कोशिश की, मगर ज़ोया एक निश्चिंत और ख़ामोश झील की तरह थी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह राकेश के साथ तो थी, पर उसके पास नहीं थी।
गाड़ी अगले स्टेशन पर रुकी। दोनों को यहीं उतरना था। मगर इस बार मंज़र बदला हुआ था। ज़ोया ने राकेश के सूटकेस की तरफ़ देखा तक नहीं। वह ख़ुद ट्रेन से नीचे उतरी और तेज़ी से प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ बढ़ गई। राकेश, जो अब भी उस ‘ठीक होने वाले’ वहम में था, बीमारों की तरह गिरता-पड़ता नीचे उतरा। दोनों वेटिंग रूम के पास वाली बेंच पर बैठ गए। राकेश ने बेताबी से पूछा, “ज़ोया, तुम अकेली तन्हा कहाँ जा रही हो? कुछ तो कहो!”
ज़ोया खामोश रही। उसके लबों पर एक रहस्यमयी चुप्पी थी। तभी पीछे से एक खनकती हुई आवाज़ आई, अरे! मुआफ़ करना ज़ोया, मैं थोड़ा लेट हो गया। शहर में ट्रैफ़िक आज बहुत ज़्यादा था।”
राकेश ने मुड़कर देखा। सामने एक बेहद , सेहतमंद और खूबसूरत शख़्स खड़ा था। उसकी आँखों में चमक थी और चाल में एतमाद। राकेश बेचैनी और जलन के मिले-जुले भाव से उसे देखने लगा, मानो पूछ रहा हो ‘कौन हो तुम?’
ज़ोया ने बड़ी गरिमा के साथ राकेश की तरफ़ देखा और कहा, “राकेश, ये ‘मालिक’ हैं, मेरे शौहर। इस शहर के एक बड़े बैंक में मैनेजर हैं।”और फिर मालिक की तरफ़ मुड़कर बहुत सहज़ता से बोली, ” मलिक, ये राकेश हैं, मेरे ‘एक्स-हसबैंड’।”
मलिक ने मुस्कुराहट के साथ राकेश की तरफ़ हाथ बढ़ाया। राकेश ने भी हाथ बढ़ाना चाहा, मगर उसके कांपते हुए हाथों में एक कामयाब मर्द से हाथ मिलाने की क़ुव्वत (ताक़त) ही न बची थी। उसे अपनी ज़िल्लत का अहसास स किसी कांटे की तरह चुभने लगा। मलिक ने भांप लिया और विनम्रता से हाथ जोड़कर ‘नमस्कार’ किया।
अगले ही पल, मालिक ने ज़ोया का हाथ अपने हाथ में थाम लिया। दोनों प्लेटफ़ॉर्म से बाहर की तरफ़ बढ़ गए। राकेश ने देखा, बाहर एक शानदार कार खड़ी थी। मलिक ने आदर के साथ कार का दरवाज़ा खोला और ज़ोया अगली सीट पर बैठ गई। इंजन स्टार्ट हुआ और कार धीरे-धीरे राकेश की निगाहों से ओझल हो गई।
पीछे प्लेटफ़ॉर्म पर सिर्फ राकेश रह गया था,अकेला, बीमार और अपनी ही ज़िंदगी से हारा हुआ मुसाफ़िर, जिसकी अगली कोई मंज़िल न थी।
पीछे रह गया सिर्फ़ स्टेशन का सन्नाटा और टूटा हुआ इंसान, अब पछताने के लिए भी कुछ न बचा था।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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