गीत
अंतरमन का मौन संवाद (गीत)
—मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
मन के भीतर कोई चुपके
धीरे-धीरे गाता है,
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
(1)
शोर बहुत है इस दुनिया में,
खो जाती पहचान,
भीड़ भरे इन रस्तों में फिर
कहाँ मिले इंसान?
जब नयन मूँद दो पल को,
कोई पास बुलाता है—
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
(2)
ना शब्दों की भाषा उसमें,
न कोई आकार,
फिर भी मन के हर कोने में
भर देता उजियार।
सत्य-असत्य की राहों का
भेद वही समझाता है—
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
(3)
जब-जब खुद से प्रश्न किए हैं,
उत्तर भीतर आए,
जग के सारे शोर किनारे
चुपके-चुप रह जाएँ।
मन की वीणा के तारों को
वह ही झंकृत कर जाता है—
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
(4)
भागमभाग भरे जीवन से
कुछ पल यदि चुरा लें हम,
अपने ही सान्निध्य बैठकर
स्वयं को फिर पा लें हम।
वह निस्तब्ध गहन नीरवता
जीवन अर्थ जगाता है—
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
(5)
मन के भीतर का उजियारा
ही सच्चा आधार हुआ,
अंतरमन के इन संवादों से
जीवन भी साकार हुआ।
जो सुन ले इस मन की पुकार को
वह प्रतिपल मुस्काता है—
मौन बने उस संवादों में
सच अपना मिल जाता है॥
मन के भीतर कोई चुपके
धीरे-धीरे गाता है…
