ग़ज़ल
मुहब्बत अब तिजारत का खुला बाजार है।
नहीं बाकी बचा अब तो दिलों में प्यार है।
दिखावा है नहीं अच्छा, लुटाना सोच के,
उधारी का लिया पैसा करे लाचार है।
जलाना अब किसी का घर,बहुत आसान है,
दिलों में हो हिक़ारत तो बने अंगार है।
ठिठोली कौन करता अब हॅंसी में दम कहाॅं,
कहाॅं है जिंदगी यह शहर ही मुर्दार है।
जवानी को लुटा देते शहादत के लिए,
समाया दिल किसी के, देश का ही प्यार है।
कहीं प्यासा कहीं भूखा जमाने में दिखा,
यहाॅं हर शक्स मतलब का बना अब यार है।
करें किस पर भरोसा आज अपना कौन है,
लिया अजमा यहाॅं हर आदमी में खार है।
सभी बनते यहाॅं दुश्मन किसे अपना कहें,
कहीं भाई कहीं गद्दार रिश्तेदार है।
छिड़ी जो जंग दुनिया में तमाशा गैस का,
मुनाफाखोर का देखो ॲंधा व्यापार है।
— शिव सन्याल
