ग़ज़ल
अपने पर कोई कतरता ही नहीं
क़ैद में कोई ठहरता ही नहीं
घूमता है जिस्म तो हर इक जगह
मन कहीं मेरा विचरता ही नहीं
घेर लेता है भँवर जब याद का
डूब कर ये दिल उबरता ही नहीं
जो बिगाड़ा उसकी इस फुरक़त ने, वो
अब किसी सूरत सँवरता ही नहीं
बाद ‘पूनम’ के अमावस है मगर
चाँद ज़िद्दी है ठहरता ही नहीं
— डॉ. पूनम माटिया
