कहानी – संतान
बचपन से ही आर्थिक धूप- छांव में पली नमिता । रोजमर्रा की जरूरते तो जरूर पूरा हो जाता लेकिन कभी पंख लगा कर उड़ने का सौभाग्य न मिला । जिससे जहां वह इरादे की पक्की थी, वही विचारों की भी बहुत धनी थी। अक्सर वह रिश्तो की लिहाज करती।
एक तरफ घर की बड़ी बेटी का फर्ज , तो बहनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती । विद्यालय में जब भी वह किसी महिला शिक्षिका को देखती तो वह अपने भविष्य की कल्पनाओं का ताना-बाना बूनने लगती, लेकिन इंटर की परीक्षा पास करते ही माता-पिता की इच्छा देख वह एक मध्यम वर्गीय परिवार में विवाह भी कर ली। वहां भी उसने साधारणता का भरपूर परिचय दिया, जिसने जैसी कहा वह सब कुछ करती। जिससे पति बृजेश ने भी नमिता की इच्छा देख आगे की पढ़ाई के लिए बी एस सी कॉलेज में दाखिला कर दिया । नमिता भी घर के कामों के साथ-साथ अपनी पढ़ाई में भी पूरा मन लगाती । यही कारण था कि वह कभी परिवार को आगे बढ़ाने की बात कहता भी तो वह भरपूर रूप से टालने का प्रयास करती।
माता-पिता भी उसकी पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियां देख शुरुआती दिनों में तो कुछ नहीं कहते लेकिन मन ही मन वंश बढ़ाने की चाहत उन्हे भी सताती।
आज घर पर तीसरा सालगिरह का समारोह था। हर पर्व त्यौहार की तरह नमिता आज भी अपने सास – ससुर के चरण स्पर्श की ही थी कि सासू मां ने व्यंग्य करते हुए कहा- बहू , अब हमें एक कान्हा के दर्शन करा दो, ताकि बची जिंदगी से कोई पछतावा न रहे । अब हम आखिर कितने दिनों के मेहमान ही है । हमारी यह आखिरी इच्छा पूरी कर दो। सासु मा ने मुस्कुराते हुए कहा।
अब बृजेश को भी अच्छा मौका मिल गया । नमिता ने भी कुछ हद तक मन बना ही लिया था। महीना दर महीना साल तक दोनों ही बच्चे का प्रयास करते रहे, लेकिन सफलता हाथ न लगी।
नमिता अब कुछ परेशान सी रहने लगी, आखिर क्यों ऐसा? कितने ही डॉक्टरी जाच करवाए, जिससे पता चला कि बृजेश में शुक्राणुओं की संख्या में अत्यधिक कमी है । यही कारण है कि वह कभी पापा नहीं बन सकते ।
यह सुनते ही बृजेश पर पहाड़ों की आधी टूट पड़ा।लंबी वक्त तक दवाइयां खाने के बाद भी डॉक्टर साहब ने 100% सुधार होने का आश्वासन नहीं दिया, जिससे बृजेश का उतरा चेहरा देख डॉक्टर ने आईसीएस इंटरासाइटोप्ला जिंक स्पर्म इंजेक्शन द्वारा बच्चे पैदा करने की सलाह भी दिये लेकिन बृजेश इन चीजों के बिल्कुल खिलाफ था। नमिता भी बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह एक न माना। अब तो दोनों में इस विषय को लेकर बात भी ना होता, लेकिन सासू मां अब हमेशा मौका देखकर चौका मार देती। यह सुन नमिता कुछ कहना चाहती भी तो अक्सर ही परिस्थितियां मुंह मोड़ लेता। अब वह बिल्कुल गुमसुम सी
रहने लगी ।
एक संध्या दोनों की चुप्पी को चीरते हुए– नमिता , मुझे पापा बनना है । बृजेश ने भावनाओं में गोते लगाते हुए कहा।
मैंने कहा तो आपसे टेस्ट ट्यूब के लिए मान लीजिए , नहीं तो किसी चाइल्ड केयर सेंटर से ही ले आते हैं। आप कुछ मानने को तैयार ही नहीं है ,तो मैं क्या करूं? नामिता ने थोडे रोष थोडे भावनाओ मे बह कर कहा।
नमिता , मुझे अपने बच्चों का हर धड़कन को समझना है, हर सासो को गिनना है । बृजेश बड़ी ही गंभीरता से कहा ।
कैसी संभव है यह सब ! नमिता ने क्रंदन पुन: भारी स्वर में कहा ।
‘ संभव है , यदि तुम्हारी मर्जी हो तो !’ बृजेश ने नरम भावनाओं से कहा ।
क्या , मेरी मर्जी ! नमिता आश्चर्य से दंग हो बोली ।
हां तुम्हारी मर्जी ,मगर कैसे? नमिता ने पुन: पूछा।
पहले तुम वादा करो कि तुम ना नहीं करोगी, तभी बताऊंगा । बृजेश ने कहा ।
मगर क्या , बताइए तो ! नमिता ने जोर देते हुए कहा।
पहले तुम प्रॉमिस करो…
अच्छा किया।
मेरै लिए आप मेरे दोस्त के साथ .. बृजेश ने गुजारिश की।
. क्या ?
प्लीज !
नहीं, ये आप क्या बोल रहे हैं ? नमिता ने झुंझलाते हुए स्वर में कहा।
झुंझलाना लाजमी समझ दोनों में चुप्पी सज गई । कुछ पल बाद नमिता ने कहा। आप ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं ।
नमिता तुम मेरी हालात समझने की कोशिश करो । मैं मजबूर हूं वरना कोई पति अपनी पत्नी को दूसरी मर्द के साथ …. बृजेश ने समझते हुए सिर झुका लिया।
यह मुझसे नहीं होगा, नमिता ने दो टुक फैसला सुनाया।
तुम सोचकर तो देखो एक बार ! बृजेश ने बड़ी ही गंभीरता से नमिता को भावनात्मक ढंग से कहा।
वक्त बीतता गया। बृजेश उसे समझाने का हर संभव प्रयास करता रहा। घर की चुप्पी देख अब बृजेश दफ्तर से आते हुए अक्सर अपने दोस्त नयन को साथ ले आता। तीनो चाय नसता करते, हंसी ठहाके लगाते , वक्त का पता भी न चलता। यह सिलसिला करीब सप्ताह महीने तक चलता रहा।
घनघोर घटाएं सूरज अपना आंचल समेटने में लगा पड़ा था। चांद अपना पहरा पसारने के लिए बिल्कुल तैयार था।
दफ्तर से आते ही ‘ आज नयन नही आए?’ नमिता ने पूछा।
नही, आज वो घर चला गया।
नमिता के इस प्रश्न ने मानो बृजेश को अपनी बात कहने का सुनहरा मौका दे दिया। मिनिटों में ही कितने ही तारीफओं के पुल बाध दिया। नमिता तुम नयन के साथ सिर्फ एक रात….. बृजेश के मुंह से यह सुनते ही….
क्या!! नमिता ने आश्चर्य से कहा।
प्लीज ना मत करो , गिड़गिड़ाते हुऎ स्वर में बृजेश ने गुजारीश की ।
मुझे घृणा आ रही है आपकी सोच पर really ….
दोनों के बीच एक अच्छी खासी खासी झड़प हो गई।
दो पल मौन हो , तुम्हारी यदि इतनी ही इच्छा है तो सामने वाला मेरी पसंद का होगा । नमिता ने अपने मन की बात कही।
बृजेश यह सुनकर दो पल अवाक हो गया, फिर भी खुद को समझाते हुए बोला– चलो ठीक है कोई बात नहीं । तुम्हारी पसंद का ही होगा , लेकिन कौन वह मुझसे जरूर बताना ।
हा, सिर हिलाते हुए दर्द से भरा स्वर साफ झलक रहा था। वह मन ही मन सोचती रही। घंटो मोबाइल की ओर नजरे दौडाती रही। इतने में उसकी नजर नवनीत के नंबर पर पड़ी।
हेलो ,
नवनीत बोल रहे हो?
हां , मगर तुम ?नवनीत ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा।
हां, मैं नमिता।
वैसे बहुत लंबे वक्त के बाद तुम्हारी आवाज सुनने को मिला। कैसी हो और घर परिवार सब कैसे हैं ? एक पर एक न जाने वह कितने ही प्रश्न पूछता गया।
‘ हां , मैं ठीक ही हूं , तुम अपनी सुनाओ ‘ नमिता ने बड़ी ही संक्षिप्तता से कहा।
मेरी तो क्या, बस बिंदास अकेले अपनी जिंदगी फाइलों के सहारे काट रहा हूं ।
क्या! तुमने अब तक शादी नहीं की ! नमिता ने जानना चाहा ।
नहीं , मुस्कुरा कर , तुम्हारे बाद इन आँखों को कोई लड़की भाया ही नही । नवनीत ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ।
चुप रहो , क्या बकवास कर रहे हो। नमिता ने एक झड़प लगाई। यार तुम बिल्कुल नहीं बदले, सचची ।
अच्छा छोड़ो यह सब, तुम यह बताओ मुझे याद करने की कोई खास वजह ? नवनीत ने जानने की इच्छा जताई।
हां, (लंबी सांस लेते हुए नमिता ने कहा )
दरअसल एक काम था मुझे तुमसे , नमिता ने कहा।
क्या ! अहो भाग्य हमारे, बताओ क्या खिदमत कर सकते हैं हम आपकी ! नवनीत ने गंभीरता से पूछा ।
नवनीत , जिस चीज के लिए मैंने बीस साल पहले तुम्हें मना किया था। आज वही गुजारिश करने आई हू। नमिता ने नजरे झुका कर बड़े ही गंभीर स्वर में कहा।
मतलब , नवनीत में आश्चर्य भरे स्वर से पूछा ।
मुझे तुम्हारा साथ चाहिए । नमिता ने प्रति उत्तर में बताया। नवनीत अंदेशे में फंसा रहा।
नमिता साफ-साफ बताओ, क्या कहना चाहती हो ? क्या गुजारिश, कैसा साथ ? नवनीत विस्तार से जानना चाहा।
नहीं , मुझे तुम्हारा एक रात चाहिए। नमिता ने बड़े ही गंभीर स्वर में कहा ।
क्या मतलब ? नवनीत ने आश्चर्य से पूछा
नमिता गीले नैनों से अपनी और बृजेश की सारी कहानी बताइ। प्लीज ना मत करना। मेरे पति मुझे किसी और के साथ बोल रहे हैं। वह मुझे मंजूर नहीं ….. किसी जमाने में यह तुम्हारी इच्छा थी इसलिए मैं तुम्हारे पास …..नमिता बड़े ही गंभीर स्वर में बोली।
क्या?
दो पल नवनीत सोचता रहा। भगवान की लीला कितनी अपरंपार है । किसी जमाने की इच्छा और आज वह …. इसलिए शायद मुझे अब तक वह कुंवारा ही रखा। कोई नहीं , चलो मुझे मंजूर है। नवनीत ने हामी भरते हुए कहा।
लेकिन एक शर्त है कि तुम्हें उससे पहले बृजेश से एक बार मिलना होगा । नमिता ने कहा।
वह क्यों ?
मेरी शर्त पर उन्होने यह कहा था।
‘ चलो कोई नहीं , तुम्हारी खुशी के लिए मुझे यह भी मंजूर है। अब मैं रखती हूं । बृजेश के दफ्तर से आने का वक्त हो गया है।
बृजेश की दफ्तर से आते ही भोजन आदि से निवृत होकर नमिता ने नवनीत के साथ हुई सारी बात बताइ, शिवाय की वह किसी जमाने के उसे प्यार करता था।
बृजेश ने उत्सुकता भरे स्वर में कहा । उससे मिलने की इच्छा जताई ।
क्योंकि परसों सुबह मुझे दफ्तर के काम से मैसूर जाना है। बृजेश ने कहा
क्या ? अचानक मैसूर !
हां दफ्तर का कुछ काम है। बृजेश ने कहा ।
अच्छा कोई नहीं , मै नवनीत को अगले सप्ताह बोल दूगी । नमिता ने कहा
अरे नहीं, मैं परसों सुबह जा रहा हूं, शाम को बुला लो । दो दिन वहां रहूगा। बृजेश ने बड़ी ही गंभीरता से कहा ।
ऐसा मत बोलिए ।
रविवार का दिन , सभी में मौज- मस्ती घूमने – फिरने की अलग चाह लेकर आता है, जिससे नवनीत भी एक फोन पर ही घर पहुंच गया। सारे कामों से निवृत होकर नमिता दोनो ने साथ भोजन आदि किया ।
नमिता दो पल गुमसुम बैठी ही थी कि नवनीत ने कमरे में अंधेरे का पहरा पसार दिया। भावनाओं के सागर में डूबता नवनीत नमिता के सामने खुद को पूरी तरह उड़ेल दिया। नमिता भी लंबी सांस लेती रही । रात्रि के सन्नाटे ने दोनों को अपनी बाहों में भर दिया। खूब मौज- मस्ती हुई, लेकिन कब आंखो ने अपना रस टपका दिया पता भी ना चला।
अगली प्रातः नमिता के बौखलाते ऑखे , अरे नवनीत चला भी गया , मुझे पता भी ना चला ! क्या सोचा होगा उसने। सवालों के भवर में ही उसकी नजर तकिए से झाकती एक पर्ची और कुछ पैसो पर पड़ी।
मेरी प्यारी प्रियेसी,
भगवान की लीला बड़ी अपरंपार है , मेरे वर्षों का तपस्या तुमने आज पूरी कर दी।
बहुत-बहुत धन्यवाद तुम्हारा और ऊपर वाले का ….लेकिन शायद तुम्हें ये देख कर बुरा लगेगा, मगर क्योंकि आज तुम किसी और की हो इसीलिए इस गरीब का यह तोहफा स्वीकार करना। क्योंकि तुम मेरी थी, मेरी हो और मेरी ही रहोगी हमेशा।
यह पढते ही उसके आंखों निर्झर झरने से बहते रहे। लंबी, खुशहाल जिंदगी और एक नन्हे फूल की कामना करते हुए ईश्वर से तुम्हारी लंबी आयु की प्रार्थना करूंगा।
सिर्फ तुम्हारा – नवनीत
नमिता खुद को समेटी ही थी कि बृजेश ने रात की खबर जाननी चाही।
ठीक ही था।
बृजेश घर आ गया । वक्त बीतता गया । महीना बीता ही था कि यह खुशखबरी मिल गई। यह सुनते ही बृजेश और नवनीत की खुशी का ठिकाना न रहा , वही नमिता के कानो मे गूंजता रहा ‘तुम सिर्फ मेरी हो।’
हर चीज की कदर करनी चाहिए, कब किसकी जरूरत पड़ जाए । नमिता के चेहरे पर भी दिखावटी हंसी सजी ही रही।
— डोली शाह
