जोहरा टूट गई थी
शहर के शोर से दूर उस पुरानी हवेली की दीवारों पर जमी काई अब सिसकियाँ लेती थी। वह हवेली, जिसे शाह जी ने अपनी जवानी का पसीना और हसरतें बेचकर खड़ा किया था, आज खुद बिकने की कगार पर थी।
से शाह जी और उनकी बीवी ज़ोहरा ने अपनी ज़िंदगी का एक ही मक़सद बना लिया था,बेटों की ‘परवरिश’। फ़ाक़े किए, पुराने कपड़े रफ़ु करके पहने, लेकिन बेटों को शहर के सबसे महंगे स्कूल भेजा। बाप ने धूप में हड्डियाँ जलाईं ताकि बेटे सात समंदर पार जा सकें। और बेटे उड़ गए। पीछे छोड़ गए एक ख़ाली कुर्सी, एक बूढ़ा आँगन और दो जोड़ी तरसती आँखें।
सालों बीत गए। फ़ोन की घंटियां बजतीं, लेकिन उनमें ममता की महक नहीं, सिर्फ़ औपचारिकता का शोर होता। “अब्बा, बिजी हूँ,” “अम्मी, यहाँ लाइफ़ बहुत फास्ट है।”हर कभी फ़ोन मत किया करो,ज़ोहरा अक्सर उस पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर बरामदे को तकती रहती, जहाँ कभी बेटों की छोटी चप्पलें बिख़री रहती थीं। शाह जी ने उसी कुर्सी पर दम तोड़ दिया। बेटे नहीं आए। एक ईमेल आया “ऑफिस में ज़रूरी प्रोजेक्ट है, हम बाद में आ जाएंगे।” मोहल्ले वालों ने शाह जी को मिट्टी दी। ज़ोहरा की आँखों का पानी सूख गया था, लेकिन उम्मीद नहीं सूखी। उसे लगा, शायद बाप का जाना बेटों को घर खींच लाएगा।लेकिन बेटे नहीं लौटे,ज़ख्म कैसे भरता जोहरा टूट गई थी
वक़्त ने एक और करवट ली। ज़ोहरा की हिम्मत ने भी जवाब दे दिया। जिस दिन ज़ोहरा ने उस खाली कुर्सी पर सिर टिकाकर आखिरी सांस ली, घर के दर-ओ-दीवार रो पड़े। इस बार बेटे आए। लेकिन मातम मनाने नहीं, ‘हिसाब’ करने।
सूट-बूट पहने, कलाई पर महंगी घड़ियाँ बांधे, दोनों बेटे हवेली के दालान में खड़े थे। पड़ोसियों ने जब मां की आखिरी तन्हाई का ज़िक्र किया, तो बड़े बेटे ने ठंडी आह भरकर कहा, “ठीक ही हुआ, अम्मी अब बहुत बीमार रहने लगी थीं। इस हालत में तड़पने से बेहतर था कि ऊपर चली गईं। हमारे लिए भी मुश्किल था बार-बार यहाँ का चक्कर काटना।”
छोटे भाई ने फ़ौरन फ़ाइल खोली, “भाई, इमोशनल बातें बाद में। डीलर बाहर खड़ा है। इस हवेली के प्लॉट की क़ीमत अभी आसमान छू रही है। इसे बेचकर हम अपनी विदेश वाली प्रॉपर्टी का लोन क्लियर कर लेंगे।”
हवेली का सौदा हुआ। कबाड़ी आया और उसने वह पुरानी कुर्सी, जिस पर बैठकर बाप ने ख़्वाब देखे थे और मां ने इंतज़ार किया था, उसे दो कौड़ियों में ट्रक में फ़ेंक दिया।
जाते वक्त बेटों ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। उनके लिए वह घर नहीं, एक ‘डेड इन्वेस्टमेंट’ था। आज जहाँ वह हवेली थी, वहाँ एक चमचमाती ऊँची इमारत खड़ी है। लोग उसे “सक्सेस” कहते हैं। लेकिन उस इमारत की बुनियाद में वह दर्द दफ़न है, जो किसी कागज़ पर नहीं लिखा गया।
वसीयत मुकम्मल हुई, बेटों को मिला डॉलर और नया बंगला। मां-बाप की रूह को मिला, “ठीक ही हुआ” जैसा जुमला। हवेली को मिला,मलब़ा।
रिश्तों की इस नीलामी को आज की दुनिया तरक्क़ी कहती है। पर सच तो यह है कि उस ट्रक में लदी वह टूटी कुर्सी ही इस दौर की सबसे बड़ी हक़ीक़त थी, तन्हाई, जो रिश्तों के कत्ल के बाद विरासत में मिलती है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सह
