कविता

युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका अब
पड़ रही भारी
तुम्हारे लिए।

क्या फायदा मिलेगा बताओ
बम-बारुद फोड़कर
तुम्हारे लिए।

जरुरी अब विचार करना
युद्ध का अत्याचार
तुम्हारे लिए।

व्यर्थ अब नहीं फैले
युद्ध की आग
तुम्हारे लिए।

आज सारा जहान पीड़ित
दुविधा में जीवन
तुम्हारे लिए।

भारी पड़ेगी आपकी सनक
समूची दुनिया पर
तुम्हारे लिए।

आओ कोशिश हम करें
सबका भला होगा
तुम्हारे लिए।

शब्द मौन हो गए
कहें भी क्या
तुम्हारे लिए।

युद्ध की विभीषिका का
अंत में विनाश
तुम्हारे लिए।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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