माँ समान कोई नहीं
संसार भर में माँ का एक विशिष्ट स्थान है लेकिन हमारे सनातन समाज में विशिष्ट के साथ-साथ माँ का बहुत ही आदरणीय स्थान है। माँ के हर तरह के स्वरूप से वात्सल्य झलकता है। बिना माँगे उसकी करुणा और दया सदैव अपने संतानों पर बरसती स्पष्ट दिखलाई देती है।
एक बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है “दुनिया में पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती”। और यही पंक्ति दुर्गा माता की आरती में होने के कारण हम-सब गाते भी हैं –
माँ-बेटे का है इस जग में,बड़ा ही निर्मल नाता।
पूत-कपूत सुने हैं , पर ना माता सुनी कुमाता॥
यह “पूत-कपूत सुने हैं , पर ना माता सुनी कुमाता” लोकोक्ति माता के असीम प्रेम और वात्सल्य को दर्शाती है, जो किसी भी तरह की विकटम परिस्थिति में भी अपने बच्चों को अकेला है, महसूस ही होने नहीं देती। बच्चों के प्रति माता की अनमोल और अटूट प्रेम के साथ देखभाल को भी दर्शाती है। सारांश यही है कि बच्चे, चाहे कितने भी गलत रास्ते पर क्यों न चले, माता हमेशा उनकी रक्षा करती है और उनकी भलाई के लिए ही कार्य करती हैं।
संक्षेप में माँ का समर्पण, त्याग-बलिदान, कड़ी मेहनत के चलते ही हम आज इस स्थिति में हैं अर्थात हमारा जीवन असीम रूप से समृद्ध हुआ है।।यही कारण है कि सभी के जीवन में माँ एक खास स्थान रखती है। इन्हीं सब के चलते हम सभी का यह मानना है कि हम आजीवन माँ की कितनी भी सेवा-शुश्रूषा करें हम ऋण मुक्त हो ही नहीं सकते।
वैसे तो अनेक नामी-गिरामी हस्तियों की मातृभक्ति के वाकये आप जानते ही होंगे लेकिन भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठ पहचान वाले भारत के महत्वपूर्ण नेताओं मे से एक, सच्चे देशभक्त,अति ईमानदार, सादगी के प्रतिमूर्ति श्री लाल बहादुर शास्त्रीजी के बाल्यकाल में, मातृभक्ति दर्शाती एक अनुकरणीय छोटी सी घटना का उल्लेख कर रहा हूँ –
एक बार लाल बहादुर शास्त्रीजी की माँ बीमार पड़ गयीं। उस समय वे सब प्रकार से अर्थात सब कार्य छोड़ माँ की सेवा में जुट गये।
एक रात माँ ने पुकारा, ‘बेटा ! मुझे प्यास लगी है’। शास्त्रीजी तुरन्त पानी का गिलास ले कर पहुँचे, लेकिन तब तक माँ की आँख लग चुकी थी।
बालक शास्त्रीजी ने माँ को जगाना उचित नहीं समझा. और वह पानी का गिलास लिए चुपचाप माँ के जागने की प्रतीक्षा करने लगे। बीमार माँ को अच्छी-खासी नींद आई जिसके फलस्वरूप वह रात भर जागी ही नहीं।
प्रातः काल जब माँ जागी, तो उन्होंने देखा कि उसका पुत्र पानी का गिलास लिए सिरहाने चुपचाप खड़ा है। माँ को रात वाली बात याद आ गयी जिसके कारण उनकी आँखों में प्रेम के आँसू भर आये। माँ ने कहा, बेटा ! तू रात-भर मेरे लिए क्यों खड़ा रहा ?
बालक शास्त्रीजी ने कहा, माँ ! तुम मेरे लिए सैंकड़ों बार रात-रात भर जागी हो, फिर मैं यदि तुम्हारे लिए एक रात जाग गया तो क्या हुआ ?
यही कारण है कि मातृदिवस के प्रति हम-सभी के दिल में एक खास स्थान है क्योंकि यह दिन हम-सभी को हमारे जीवन में माँ के व्यक्तित्व की प्रभावशाली भूमिका को स्वीकार करने और सम्मान देने का मौका देती है। हम-सभी मान सकते हैं कि यह उनके पालन-पोषण, मार्गदर्शन, कड़ी मेहनत और बलिदान को याद कर उनके प्रति प्यार, आभार और मान्यता व्यक्त करने के लिए समर्पित दिन है।
अन्त में सभी वर्णित तथ्यों का निचोड़ यही है कि मातृभक्ति ही सर्वोपरि है क्योंकि माँ ही सृष्टि का आधार होती है।इसीको पुष्ट करती किसी कवि की एक पंक्ति याद आ गयी, जो इस प्रकार है –
मातृ भक्ति शक्ति की, विलक्षण अभिव्यक्ति है।
कैसे जियें जीवन, बताती इसकी युक्ति है।।
— गोवर्द्धन दास बिन्नाणी “राजा बाबू”
