इतिहास

काश्मीर के इतिहास की अज्ञात वीरांगना रानी दिद्दा

हमारे देश में महिलाओं की वीरगाथा का इतिहास रहा है. इस देश में सिर्फ रानी झांसी ही अकेली मर्दाना नहीं थी जिसने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए बल्कि इसी देश में अन्य कई वीरांगनाएं समाज में भी और राज परिवारों में भी थी जिनकी चतुरबुद्धि और साहस के आगे अच्छे-अच्छों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है.ऐसी हीवीरांगना एक लंगड़ी रानी भी थी जिसने अपने लंगड़ेपन को कमजोरी नहीं मजबूती बनाया, देश पर राज किया और महमूद गज़नवी जैसे लुटेरे को एक बार नहीं बल्कि दो-दो बार देश से खदेड़ दिया. ऐसी वीरांगना थी कश्मीर की रानी दिद्दा. जिसके बारे में न तो बहुत कुछ पढ़ा गया है और न हीं कुछ सुना ही गया है.प्राचीन संस्कृत कवि कल्हण ने कश्मीर के इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिला शासक दिद्दा का उल्लेख किया है।राजतरंगिणी,कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है’राजतरंगिणी’ का शाब्दिक अर्थ है – राजाओं की नदी,जिसका भावार्थ है – ‘राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह’ यह कविता के रूप में है।इसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होकर 1154 A.D. तक का है।राजतरंगिणी अनुसारदिद्दा रानी काबुल के हिन्दुशाही राजा भीम शाही की पौत्री थी | पिता सिंहराज लोहार राजवंश (आज का हरियाणा, पंजाब ,पुंज राजोरी जिसका भाग था) के राजा थे जिनके घर जन्मी एक खूबसूरत नन्ही बच्ची को उसके माँ बाप सिर्फ इसलिए त्याग देते हैं कि वो अपंग पैदा हुई . नौकरानी का दूध पीकर पली बढ़ी वो लड़की अपने अपंग होने को बाधा न मानते हुए वो युद्ध कला में पारंगत हुई और तरह तरह के खेलों में निपुणता हासिल की .और रानी दिद्दा के नाम से जानी गई अपंग होने से दिद्दा को लंगडी रानी भी कहा जाता है | एक दिन आखेट के दौरान कश्मीर के राजा क्षेमगुप्त ने जब उस खूबसूरत राजकुमारी दिद्दा को देखा तो पहली ही नज़र में दिल दे बैठा. ये जान लेने के बाद भी कि दिद्दा लंगड़ी है , राजा क्षेमगुप्त ने उस से ब्याह रचाया और दिद्दा की किस्मत एक तरह से पलटी खा गयी. उसे पति का प्यार , मान सम्मान , पुत्र रत्न तो मिला ही , साथ ही उसने क्षेमगुप्त के राज काज में भी भागीदारी निभानी शुरू कर दी. इस भागीदारी के सम्मान में राजा ने अपनी पत्नी के नाम पर सिक्का जारी किया . वो ऐसा पहला राजा बना जो अपनी पत्नी के नाम से जाना गया .लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था |
वर्ष ९५८ ई . में एक दिन आखेट के दौरान क्षेमगुप्त की मृत्यु होते ही दिद्दा की ज़िन्दगी उस दौराहे पर खड़ी थी जहाँ एक तरफ पति कि मृत्यु का दुःख और सती हो जाने की परंपरा थी और दूसरी तरफ एक नन्हे राजकुमार के राज पाठ संभालने लायक होने तक उसके पालन पोषण और शिक्षा दीक्षा की ज़िम्मेदारी निभाने वाली माँ का दायित्व | . मरते राजा को राज्य सुरक्षित हाथों में देने का प्रण उसे यकायक वो शक्ति दे जाता है कि जिसके चलते उसने सती होने से मना कर दिया .. दिद्दा ने ना सिर्फ इससे इंकार किया बल्कि अपने बेटे अभिन्यु को गद्दी पर बिठाकर राजमाता बन गईं और शासन चलाने लगी। लोग इससे हरगिज खुश न थे। स्थानीय सरदारों ने कहा, एक औरत हम पर शासन कैसे कर सकती है।उसका वचन नहीं चल सकता। दिद्दा ने जवाब दिया, मेरा वचन ही है मेरा शासन और सरदारों का विद्रोह बुरी तरह कुचल दिया गया। 972 ई. में महराजा अभिन्यु भी चल बसे लेकिन दिद्दा का शासन चलता रहा।उन्होंने अपने पोते भीमगुप्त को गद्दी पर बिठाया और राजकाज चलाती रहीं। दिद्दा की जीवन यात्रा एक अद्भुत कथानक है जो एक अनचाही अपंग कन्या से शुरू होकर , कश्मीर के राजा की बीवी बनने और फिर विधवा होने के बाद राज्य संभालने ,कई युद्ध करने और युद्ध जीतने के लिए गुरिल्ला तकनीक सीखने और अपनाने के प्रसंग से होती हुई उस दिलचस्प मोड़ से गुज़रती है कहा जाता है कि कुछ राजनैतिक कारणों से वर्ष ९८० ई . रानी दिद्दा ने राजा भीमगुप्त को भी मरवा डाला तथा स्वयं ने ही राजसत्ता सम्हाल ली | संभवतः विश्व कि प्रथम कमांडो सेना , एकांगी सेना के बनने का घटनाक्रम भी रानी दिद्दा से ही सम्बद्ध है सम्राज्ञी दिद्दा ने शस्त्र प्रशिक्षण में महारत प्राप्त की थी। चारों दिशाओं में ऐसी वीर नारी और कोई नहीं थी। भगवा ध्वज का परचम अश्शूर राज्य तक लहराया था। रानी दिद्दा का राज्य कश्यपमेरु (कश्मीर) से लेकर मध्य एशिया तक फैला हुआ था। महारानी दिद्दा नियुद्धकला में निपुण थीं , यह एक प्राचीन भारतीय युद्ध कला (मार्शल आर्ट) है। ▪नियुद्ध का शाब्दिक अर्थ है ‘बिना हथियार के युद्ध’ अर्थात् स्वयं निःशस्त्र रहते हुये आक्रमण तथा संरक्षण करने की कला। ▪यन्त्र-मुक्ता कला – अस्त्र-शस्त्र के उपकरण जैसे घनुष और बाण चलने की कला। ▪पाणि-मुक्ता कला – हाथ से फैंके जाने वाले अस्त्र जैसे कि भाला। ▪मुक्ता-मुक्ता कला – हाथ में पकड कर किन्तु अस्त्र की तरह प्रहार करने वाले शस्त्र जैसे कि बर्छी, त्रिशूल आदि। ▪हस्त-शस्त्र कला – हाथ में पकड कर आघात करने वाले हथियार जैसे तलवार, गदा आदि। ▪ऐसी 52 युद्ध कलाओं का प्रशिक्षण लेकर गुरुकुल से योद्धा बनकर निकली योद्धा दिद्धा ने भविष्यकाल में सम्राज्ञी दिद्दा बन कर भगवा ध्वज का परचम मध्य एशिया तक लहराकर भारतवर्ष एवं सनातन धर्म की गौरवमयी एवं स्वर्णिम इतिहास रच डाला था।दिद्दा इतनी तीक्ष्णबुद्दि थी कि वह चंद मिनटों में बाजी पलट दिया करती थी. आज जिस सेना के कमांडो और गुरिल्ला वार फेयर पर दुनिया चालाकी की जंग लड़ती है वह इसी लंगड़ी रानी की देन है. चुड़ैल लंगड़ी रानी के इतिहास को खंगालने पर पता चलता है कि इसने 35000 सेना की टुकड़ी के सामने 500 की छोटी सी सेना के साथ पहुंची और 45 मिनट में युद्ध जीत लिया. सबके बीच उस खूंखार मेहमूद गज़नवी का भी ज़िक्र आता है जिसके हिन्दुस्तान में प्रवेश करने के बाद जो विध्वंस हुआ उसका अपना एक लम्बा इतिहास है . इस किताब में मेहमूद गज़नी के ज़िक्र का प्रसंग एक ऐसा प्रसंग है जिस से लोग अनभिज्ञ हैं . सोमनाथ का मंदिर लूटने वाले और कई शहरों को तहस नहस करने वाले गजनी को दिद्दा ने अपनी रणनीति से एक नहीं दो दो बार भारत में घुसने से रोका और युद्ध में हराया , जिसके बाद उसने रास्ता बदला और गुजरात के रास्ते भारत में प्रवेश किया.यद्यपि कहीं कहीं यह जिक्र है किओ महमूद गजनवी का आक्रमण काल रानी दिद्दा की म्रत्यु के बाद राजा संग्रम्राज के समय का है | एक अन्य घटनाक्रम में बाल्कन के कृमसाम्राज्य के शासक बोरिसद्वितीय ने सन् 969 ई. में कश्मीर पर आक्रमण किया था(जिसे आज बल्ख नाम से जाना जाता है)। किसी समय वह सम्राज्ञी दिद्दा के राज्य का हिस्सा हुआ करता था। महारानी दिद्दा केवल कुशल शासिका ही नहीं एक कुशल रणनीतिज्ञ भी थी। दिद्दा ने एक कुशल सेना संचालिका होने के नाते सोचा ना जा सके ऐसा युद्धव्यूह की रचना की और यवन शासक बोरिस की शक्तिशाली सेना बल ने आधे घंटे के अन्दर घुटने टेक दिए।जहाँ कायर बोरिस बारह हज़ार सैनिकों की आड़ लेकर लड़ रहा था वही सम्राज्ञी दिद्दा स्वयं मोर्चा सँभालते हुए सेनाबल के आगे खड़ी थी। बोरिस सर्पव्यूह का प्रहार झेल नहीं पाया और प्राचीन भारतीय युद्ध व्यूह की रचना यवनों की समझ के बाहर थी।रानी दिद्दा के आगे बचे सैनिकों के साथ हथियार डाल कर आत्मसमर्पण कर दिया एवं बाल्कन , बुल्गारिया की साम्राज्य पर रानी दिद्दा ने केसरिया परचम लहराकर भारतीय इतिहास में स्वर्णिम इतिहास का एक और पृष्ठ जोड़ दिया था।
सन 972 ई. में यारोपोल्क_प्रथम को हरा कर रूस साम्राज्य की एक चौथाई हिस्से पर सम्राज्ञी दिद्दा ने अपना अधिपत्य स्थापित किया था। इस विदुषी अवतरित नारी की रणकौशलता को देख पराजित रूसी राजा ने स्वयं अपने किताब दक्षिण एशिया नारी (South Asian Women)किताब में साम्राज्ञी दिद्दा की बुद्धि एवं शक्ति का वर्णन करते हुये कहा है कि:-उनकी(यारोपोल्क प्रथम)हार के पीछे यह कारण था की उसका युद्ध(सम्राज्ञी दिद्दा)एक कुशल रणनीतिज्ञ एवं एक बुद्धिमती, पराक्रमी अद्भुत सैन्यसंचालिका से हुई थी इसलिए उसके पास एक ही रास्ता था मृत्यु या आत्मसमर्पण जिसमे से यारोपोल्क प्रथम ने आत्मसमर्पण करना उचित समझा था।
दिद्दा ने युद्ध कोपुशल के अलावा अन्य सभी सामाजिक क्षेत्रो में भी अपनी विद्वता दर्शाई | नारी शिक्षा एवं उत्थान के अनेकों प्रकल्प शुरू करवाए।
दिद्दा ने मठ/मंदिरों के निर्माण में भी पूरी रुचि ली। श्रीनगर (कश्मीर) में आज भी एक मोहल्ला ‘दिद्दामर्ग’ के नाम से जाना जाता है यहीं पर एक विशाल सार्वजनिक भवन दिद्दा मठ के नाम से बनवाया गया। इस विशाल मठ के खंडहर आज भी मौजूद हैं। पराक्रमी उत्पलवंश के एक अति यशस्वी सरदार सिंहराज की पुत्री दिद्दा ने एक शक्तिशाली कूटनीतिज्ञ के रूप में पचास वर्षों तक अपना वर्चस्व बनाए रखा।उत्पलवंश के ख्याति प्राप्त राजाओं ने कश्मीर के इतिहास में अपना गौरवशाली स्थान अपने शौर्य से बनाया है। स्थानीय लोग आज भी लोक कथाओं में दिद्दा की हिम्मत और कुशलता का गुणगान करते हैं।
दिद्दा भारत के इतिहास के उन महत्वपूर्ण चरित्रों में से है , जिन्होंने षड्यंत्रों और हत्याओं की राजनीति एवं आक्रमणकारी पर निरंतर विजय प्राप्त की।
इस वीरवती साम्राज्ञी ने विद्रोहों एवं कठिनाइयों से ग्रस्त कश्मीर राज्य को अपने साहस और योग्यता से संगठित रखा।
दिद्दा ने देशभक्त एवं योग्य लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करके देशद्रोहियों एवं अक्षम प्रशासनिक अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखाया।
इस शक्तिशाली रानी ने अनेक गद्दार लोगों को उम्रकैद तथा मृत्युदंड तक दिए। कश्यपमेरु(कश्मीर) राज्य की सुरक्षा के लिए ऐसा करना आवश्यक था। दिद्दा को जहां वामपंथी इतिहासकारों ने निष्ठुर-निर्दयी कहा, वहीं इस रानी को न केवल भारतीय राष्ट्रभक्त एवं विदेशी इतिहासकारों द्वारा कुशल शासक माना गया है |
‘राजा विक्रमादित्य के बाद ज़मीन और शासकों को जोड़कर एक अखंड साम्राज्य पर राज्य करने वाली उस अभूतपूर्व रानी की पूरी कहानी जानने का दावा कोई नहीं कर सकता. पर, इसे पढ़ने, के बाद ऐसा लगता है कि इस कहानी के माध्यम से लेखक ने जानकारियों के उलब्ध टुकड़ों को जोड़कर शौर्य बहादुर वीरांगना रानी दिद्दा की कहानी लोगों तक पहुंचाने की एक कोशिश की है. सच पूछिए तो रानी दिद्दा की कहानी आज के जमाने में और समसामयिक तब और हो जाती है ,जब बहुत-सी महिलाएं अपने संघर्षों भरी यात्रा के बाद सत्ता और ऊंचे पदों पर न सिर्फ बैठ रही हैं, बल्कि अपनी काबलियत से दुनियां को चौंका रही हैं. बिलकुल वैसे ही, जैसे 1200 साल पहले रानी दिद्दा ने किया था. काश्मीर की इस वीरांगना रानी के बारे में अन्य इतिहासकारों ने ज्यादा नहीं लिखा है इसका कारण क्या हो सकता है यह भी शौध का विषय है लेकिन कल्हण की राजतरंगीनी के अलावा एक अन्य लेखक आशीष कौल द्वारा भी दिद्दा रानी का सम्पूर्ण जीवानवृत्त लिखा गया है रानी दिद्दा की जीवन पर लिखी इस किताब को रूपा पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है | सन ९७२ में रानी दिद्दा से पराजित रूसी साम्राज्य के राजा योरोपोल्क प्रथम ने भी अपनी किताब “ साउथ एशियन वूमेन “ में रानी दिद्दा के बारे में विस्तार से लिखा है
सन्दर्भ–
१) ‘राजतरंगिणी’ कल्हण द्वारा रचित काश्मीर का इतिहास
२) दिद्दा द वारियर क्वीन आफ काश्मीर एतिहासिक उपन्यास लेखक आशीष कौल

— महेश शर्मा

महेश शर्मा

जन्म -----१ दिसम्बर १९५४ शिक्षा -----विज्ञान स्नातक एवं प्राकृतिक चिकित्सक रूचि ----लेखन पठान पाठन गायन पर्यटन कार्य परिमाण ---- लभग ४५ लघुकथाएं ६५ कहानियां २०० से अधिक गीत२०० के लगभग गज़लें कवितायेँ लगभग ५० एवं एनी विधाओं में भी प्रकाशन --- दो कहानी संग्रह १- हरिद्वार के हरी -२ – आखिर कब तक एक गीत संग्रह ,, मैं गीत किसी बंजारे का ,, दो उपन्यास १- एक सफ़र घर आँगन से कोठे तक २—अँधेरे से उजाले की और इनके अलावा विभिन्न पत्रिकाओं जैसे हंस , साहित्य अमृत , नया ज्ञानोदय , परिकथा , परिंदे वीणा , ककसाड , कथाबिम्ब , सोच विचार , मुक्तांचल , मधुरांचल , नूतन कहानियां , इन्द्रप्रस्थ भारती और एनी कई पत्रिकाओं में एक सौ पचास से अधिक रचनाएं प्रकाशित एक कहानी ,, गरम रोटी का श्री राम सभागार दिल्ली में रूबरू नाट्य संस्था द्वारा मंचन मंचन सम्मान --- म प्र . संस्कृति विभाग से साहित्य पुरस्कार , बनारस से सोच्विछार पत्रिका द्वारा ग्राम्य कहानी पुरस्कार , लघुकथा के लिए शब्द निष्ठा पुरस्कार ,श्री गोविन्द हिन्दी सेवा समिती द्वाराहिंदी भाषा रत्न पुरस्कार एवं एनी कई पुरस्कार सम्प्रति – सेवा निवृत बेंक अधिकारी , रोटरी क्लब अध्यक्ष रहते हुए सामाजिक योगदान , मंचीय काव्य पाठ एनी सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्य संपर्क --- धार मध्यप्रदेश – मो न ९३४०१९८९७६ ऐ मेल –mahesh .k111555@gmail.com वर्तमान निवास – महेश शर्मा द्वारा डा . गौरव शर्मा 301 तीसरा माला के जी एम हॉस्टल न्यू फेकल्टी 'खदरा' इरादत नगर पक्के पूल के पास लखनऊ उत्तर प्रदेश पिन 226020

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