कविता

माता-पिता की सेवा

माता पिता की कर ले सेवा।
खायेगा तू मिश्री मेवा।।
मान ले प्यारे मेरा कहना।
जीवन का ये सुंदर गहना।।

सबके कहाँ नसीब में होता।
जान-बूझकर तू क्यों खोता।।
भाग्य-भाग्य की अलग कहानी।
जिसे सुनाती दादी-नानी।।

धरती पर जबसे वो लाए।
आप स्वयं को हैं बिसराए।।
बच्चों खातिर दिन भर खटते।
फिर भी कभी नहीं है थकते।।

जीवन का आधार हैं बच्चे।
कहते सदा मात-पितु सच्चे।।
समय खेलता खेल निराला।
जिसने हमको दिया निवाला।।

आई आज हमारी बारी।
बूढ़े हुए पिता महतारी।।
नहीं करो सेवा उपकारी।
कर्ज़ मुक्त कब हो संसारी।।

ईश्वर कृपा मातु-पितु साथा।
नहीं पीटिए अपना माथा।।
सबसे बड़े मातु-पित देवा।
सेवा करके खाओ मेवा।।

अपना जीवन धन्य बनाओ।
इनका दिल न कभी दुखाओ।।
सारे तीर्थ इन्हीं चरणों में।
आप बसा लो रोम-रोम में।।

यमराज मित्र का मानो कहना।
आशीषों का पाओ गहना।।
सेवाव्रती आप कहलाओ।
अपना जीवन धन्य बनाओ।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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