माता-पिता की सेवा
माता पिता की कर ले सेवा।
खायेगा तू मिश्री मेवा।।
मान ले प्यारे मेरा कहना।
जीवन का ये सुंदर गहना।।
सबके कहाँ नसीब में होता।
जान-बूझकर तू क्यों खोता।।
भाग्य-भाग्य की अलग कहानी।
जिसे सुनाती दादी-नानी।।
धरती पर जबसे वो लाए।
आप स्वयं को हैं बिसराए।।
बच्चों खातिर दिन भर खटते।
फिर भी कभी नहीं है थकते।।
जीवन का आधार हैं बच्चे।
कहते सदा मात-पितु सच्चे।।
समय खेलता खेल निराला।
जिसने हमको दिया निवाला।।
आई आज हमारी बारी।
बूढ़े हुए पिता महतारी।।
नहीं करो सेवा उपकारी।
कर्ज़ मुक्त कब हो संसारी।।
ईश्वर कृपा मातु-पितु साथा।
नहीं पीटिए अपना माथा।।
सबसे बड़े मातु-पित देवा।
सेवा करके खाओ मेवा।।
अपना जीवन धन्य बनाओ।
इनका दिल न कभी दुखाओ।।
सारे तीर्थ इन्हीं चरणों में।
आप बसा लो रोम-रोम में।।
यमराज मित्र का मानो कहना।
आशीषों का पाओ गहना।।
सेवाव्रती आप कहलाओ।
अपना जीवन धन्य बनाओ।।
