कविता

माता-पिता की यादें

आज जब आप दोनों हमारे साथ नहीं हैं
तब लगता है मैं एकदम अकेला हो गया हूँ,
सुख-समृद्धि, मान सम्मान के बाद भी
खुशियों को अकाल से जूझ रहा हूँ।
आज समझ में आता है आप-दोनों के होने का दम,
पर हम नासमझ, नादान तब नहीं समझ पाये,
और आज जब समझ में आता है
तब आप हमसे दूर, बहुत दूर हैं।
आपके होने भर से हर कमी पूरी हो जाती थी,
आज तो हर समय कुछ न कुछ कमी ही नजर आती है।
बच्चे बड़े हो रहे हैं, तब माँ-बाप का मतलब
हम सब अच्छे से समझ पा रहे हैं,
जो हमने आपके रहते किया
वही आज के बच्चे हमारे साथ कर रहे हैं,
बिल्कुल वैसा ही जैसा हम आपके साथ कर रहे थे।
दिन रात कोल्हू का बैल बने रहते हैं
फिर भी शिकवा शिकायतों के अंबार लगे रहते हैं,
अपने लिए समय ही नहीं निकल पाता,
ऐसा लग रहा है जीने के बजाय जीवन बस ढो रहे हैं,
या शायद माँ-बाप होने का पाठ पढ़ रहे हैं,
अपनी नैतिक जिम्मेदारी किसी तरह निभा रहे हैं।
मुँह छुपाने के लिए माँ का आँचल
और रोने के लिए सिर रखने का कंधा खोज रहे हैं,
पर अफसोस सिर्फ खुद को कोसने के सिवा
कुछ भी तो नहीं कर पा रहे हैं।
माँ- बाप क्या होते हैं, यह अब समझ रहे हैं,
क्योंकि आज जब हम खुद माँ-बाप बनकर
इसका वास्तविक अनुभव कर रहे हैं,
सच कहूँ, तब आप दोनों बहुत याद आ रहे हैं
और हम आँसू बहाते हुए तड़प कर रह जा रहे हैं,
हमारी बेबसी देखिए कि हम अपने अपराधों की
माफी भी नहीं माँग पा रहे हैं,
सिर्फ सिर झुकाकर आप दोनों के
चरणों में नमन, वंदन कर रहे हैं,
आपके साथ बीते एक-एक पल को याद कर रहे हैं
और मन-मसोस कर रह जा रहे हैं।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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