हमने थामे हाथ॥
जिन्हें पहुँचाया शिखर तक, हमने थामे हाथ।
वही आज समझा रहे, हमको अपनी बात॥
हमसे सीखी राह थी, चलना हरदम साथ।
वही अब आँखें दिखा, करते तीखी बात।।
मन के अंतर-द्वार पर, टूटा सारा साथ…
जिन्हें पहुँचाया शिखर तक, हमने थामे हाथ॥
सुख-दुख में जो संग थे, दिन हो चाहे रात।
वही आज दूरी रचें, बदले अपने साथ।।
विश्वासों के सेतु पर, लगने लगे हैं घात…
जिन्हें पहुँचाया शिखर तक, हमने थामे हाथ॥
आओ फिर से जोड़ लें, बिखरे सब हालात।
प्रेम-सूत्र में लें पिरो, हर दिल की हर बात।।
हाथों में फिर हाथ हों, लौटे सच्चा साथ…
जिन्हें पहुँचाया शिखर तक, हमने थामे हाथ॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
