जनता की सरकार
कर्ज गरीबों का घटा, कहे भले सरकार।
सौरभ के खाते रही, बाक़ी वही उधार॥
कागज़ पर समृद्धि लिखी, सूना हर बाज़ार।
चूल्हे पर रोटी नहीं, बढ़े रोज़ ही भार॥
मंचों पर जयकार है, पर जनता लाचार।
झूठे वादों से भरा, सत्ता का व्यापार॥
मेहनत करके थक गया, श्रमिक हुआ बीमार।
खेतों में सूखा पड़ा, रोता कृषक अपार॥
महँगाई की मार से, टूटा घर-परिवार।
कैसे सपने पालिए, जब खाली भंडार॥
जनता सब पहचानती, किसका सच्चा प्यार।
वोट पड़ेगा सोचकर, होगा अब विचार॥
सच की आँधी जब उठे, काँपे झूठा द्वार।
फिर बदलेगी एक दिन, जनता की सरकार॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
