होंगे नये प्रभात
लोकतंत्र अब रो रहा, देख बुरे हालात।
संसद में चलने लगे, थप्पड़-घूँसे, लात॥
मर्यादा के नाम पर, होती केवल बात।
शब्दों में शालीनता, कर्मों में आघात॥
जनसेवा की राह से, भटके सब जज़्बात।
कुर्सी खातिर भूलते, रिश्ते औ’ औकात॥
नीति गई कोने पड़ी, छाया स्वार्थ-विषाद।
जनता के विश्वास पर, होते रोज़ विवाद॥
वाणी में कटुता बढ़ी, टूटे सब संवाद।
सत्य दबा कोने खड़ा, झूठ हुआ आबाद॥
फिर भी आशा जीवित है, बदलेगा दिन-रात।
जागेगी जनता तभी, होंगे नये प्रभात॥
सच की शक्ति जीतकर, देगी फिर सौगात।
लोकतंत्र मुस्का उठे, मिट जायेंगे घात॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
