पहाड़ों की नई जीवन रेखा, दुर्गम क्षेत्रों में सड़क क्रांति और विकसित भारत
भारत की भौगोलिक संरचना जितनी विविधतापूर्ण है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी। उत्तर के ऊंचे हिमालयी शिखरों से लेकर उत्तर-पूर्व की दुर्गम पहाड़ियों तक, एक समय था जब विकास की किरणें इन दुर्गम क्षेत्रों की चोटियों पर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती थीं। लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। वर्तमान में सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों तक पहुँचती सड़कें केवल डामर और कंक्रीट का जाल नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र रूपी शरीर की शिराएं और धमनियांबन चुकी हैं।जिस प्रकार मानव शरीर में धमनियां ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय से शरीर के अंगों तक पहुँचाती हैं और शिराएं उसे वापस लाती हैं, ठीक उसी प्रकार ये सड़कें देश के मुख्य आर्थिक केंद्रों को सुदूर गांवों से जोड़ रही हैं।आर्थिक गतिशीलता, इन सड़कों के माध्यम से पहाड़ों का स्थानीय उत्पाद,चाहे वह जैविक फल हों, हस्तशिल्प हो या जड़ी-बूटियाँ,अब सीधे बड़े बाजारों तक पहुँच रहा है। यह ‘रक्त’ का वह प्रवाह है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर रहा है। पहले एक बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाने के लिए कई किलोमीटर पालकी या कंधे पर ढोना पड़ता था। आज एंबुलेंस सीधे घर के दरवाजे तक पहुँच रही है। दुर्गम क्षेत्रों के बच्चे अब उच्च शिक्षा के लिए शहरों से बेहतर तरीके से जुड़ पा रहे हैं।भारत के सीमावर्ती इलाकों में सड़कों का जाल बिछना केवल पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। ‘सीमा सड़क संगठन’ जैसी संस्थाएं कठिन परिस्थितियों में भी ऐसी सड़कों और सुरंगों (जैसे अटल टनल) का निर्माण कर रही हैं, जो हर मौसम में संपर्क बनाए रखती हैं।
“सड़क केवल दो स्थानों को नहीं जोड़ती, बल्कि यह दो संस्कृतियों, दो उम्मीदों और ‘अंत्योदय’ के संकल्प को भी जोड़ती है।”परिदृश्य तेज़ी से बदला है,सुविधाएं अब आमजन की पहुंच में हैं।
विकसित भारत के विजन में ‘कनेक्टिविटी’ सबसे बड़ा स्तंभ है। जब सड़कें सुदूर गांव तक पहुँचती हैं, तो अपने साथ निम्नलिखित सुविधाएं भी लाती हैं।
डिजिटल इंडिया का विस्तार दिखाई देता है,सड़क के साथ-साथ ऑप्टिकल फाइबर बिछाना आसान हो जाता है, जिससे पहाड़ों में इंटरनेट पहुँच रहा है।
पर्यटन को बढ़ावा मिला है,ग्रामीण पर्यटन के जरिए स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।
पलायन पर रोक लगी है,जब सुविधाएं और रोजगार गांव में ही मिलने लगते हैं, तो शहरों की ओर होने वाला मजबूर पलायन कम होने लगा है।
सड़कों का यह बढ़ता जाल इस बात का प्रमाण है कि विकास अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। देश के सबसे पिछड़े और दुरूह इलाकों तक पहुँचती ये ‘धमनियां’ राष्ट्र के शरीर में ऊर्जा का नया संचार कर रही हैं। यह बदलता बुनियादी ढांचा इस बात की गारंटी है कि विकसित भारत की यात्रा में कोई भी नागरिक और कोई भी क्षेत्र पीछे नहीं छूटेगा। आज पहाड़ केवल देखने में सुंदर नहीं रहे, बल्कि वे रहने और विकास करने के लिए भी सुलभ हो गए हैं।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
