अबूझमाड़ – पहली बार चमकी रात
अंधेरे की चादर ओढ़े, बरसों से सोया हुआ था गाँव,
ना दीपक, ना उजियारा, जंगल, पगडंडी और ठांव।
आज़ादी के 78 बरस बाद, पहली बार चमकी रात,
एक बल्ब की रोशनी में, ‘जगमग’ हो उठी हर बात।
नन्हीं आँखों में हैं सपने, बूढ़ी आँखों में नमी-सी थी,
उजाले को तरसे थे सब, खुशियों की घड़ी यही थी।
पगडंडियों से होकर आई, संघर्षों की लंबी यह राह,
हर तार में जुड़ी कहानी, हर खंभे में छुपी एक चाह।
अब ना सिर्फ़ रात कटेगी, सपनों को भी पंख लगेंगे,
अबूझमाड़ के इस सवेरे में, नए कल के रंग खिलेंगे।
(संदर्भ – इतापानार गांव में पहली बार जला बल्ब)
— संजय एम तराणेकर
