कहानी

कागज़ के टुकड़े

अलमारी के सबसे पिछले हिस्से में, कपड़ों की तहों के नीचे दबे वो चंद नोट महज़ कागज़ के टुकड़े नहीं थे, बल्कि उसकी बेचैन रूह का एक गुप्त रास्ता थे। वह कई दिनों से अपनी पत्नी की नज़रों से बचकर यह रकम जोड़ रहा था,एक ऐसे सफ़र के लिए जिसका नाम लेने की हिम्मत उसमें नहीं थी। उसके सीने के एक कोने में उसकी वह महबूबा बसी थी जो बरसों पहले शहर की चकाचौंध में कहीं खो गई थी। वक्त गुज़र गया, उसके अपने दो मासूम बच्चे थे जिनसे वह बेपनाह मोहब्बत करता था, मगर दिल की आग ठंडी न हुई थी। सच तो यह है कि इंसान कितना भी बुद्धिमान या उम्रदराज़ क्यों न हो जाए, पुरानी आग की तपिश कभी राख नहीं होती।
एक सुबह, घर में कोई मामूली सा बहाना बनाकर वह रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ा। स्टेशन पर लोगों का हुजूम था,कोई गुनगुना रहा था तो कोई अपनों के इंतज़ार में मुस्कुरा रहा था। वह टिकट की लंबी क़तार में खड़ा बार-बार अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को देख रहा था। ट्रेन का वक्त करीब आ रहा था और उसके साथ ही उसके दिल की धड़कनें भी उसे डरा रही थीं, कि कहीं यह मौक़ा हाथ से निकल न जाए, कहीं वह अतीत से मिलने की इस आख़िरी कोशिश में पिछड़ न जाए।
जब ट्रेन चली, तो खिड़की से बाहर भागते हुए पेड़ और बस्तियाँ उसके अतीत के धुंधलकों की तरह पीछे छूटने लगे। सफ़र के दौरान उसे अपनी पत्नी का निस्वार्थ चेहरा और बच्चों की मासूम हँसी याद आने लगी। उसके दिल में एक अजीब सी क़शमक़श थी,एक तरफ़ वह अधूरा इश्क़ था जो उसे खींच रहा था, और दूसरी तरफ वह मुकम्मल परिवार था जो उसकी क़ायनात था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि इंसानी दिल कितना विशाल है, जहाँ दो अलग-अलग तरह की मोहब्बतें एक साथ बसेरा कर सकती हैं।
जब वह शहर पहुँचा, तो उसका दिल मुट्ठी में बंद किसी परिंदे की तरह फड़क रहा था। लेकिन वहाँ जो मंज़र उसका मुंतज़िर था, उसने उसे पत्थर बना दिया। उसकी महबूबा अपने पति और बच्चों के साथ बेहद ख़ुशहाल और खुशमिज़ाज दिख रही थी। उसके चेहरे की वह चमक और हंसी चीख़-चीख़ कर कह रही थी कि वह अपनी ज़िंदगी के नए रास्तों पर बहुत आगे निकल चुकी है।
यह नज़ारा उसके दिल के लिए एक नया सदमा था, मगर इसी पल उसे एक शाश्वत सत्य का बोध हुआ। वह समझ गया कि रास्ते जुदा हो जाने का मतलब यादों का ख़त्म होना नहीं है, लेकिन उन रास्तों पर दोबारा मुड़कर देखना बेमानी है। उसकी आँखों से एक आँसू टपका, जिसमें बिछड़ने का दर्द भी था और हक़ीक़त को स्वीकार कर लेने का सुकून भी।
वापसी की ट्रेन में वह एक बदला हुआ इंसान था। उसने अपना वह थैला खोला जिसमें पुरानी तस्वीरें और वह डायरी मौजूद थी, जिसके हर पन्ने पर उसने अपनी महबूबा के लिए हज़ारों बातें लिखी थीं। उसने धीरे-धीरे उन कागज़ों को टुकड़ों में फाड़ा और ट्रेन की खिड़की से बाहर उड़ा दिया। वे यादें सफ़ेद परिंदों की तरह हवा में बिखर गईं,यह उसके अतीत से आज़ाद होने का एलान था।
उसने स्टेशन पर रुककर उन्हीं बचाए हुए पैसों से, जो कभी उसने अपनी महबूबा की याद में बचाए थे, अपनी पत्नी और बच्चों के लिए ढेर सारे तोहफे और सामान ख़रीदे। अब उन पैसों का मक़सद बदल चुका था।
जब वह घर पहुँचा, तो शाम के साये गहरे हो रहे थे। दरवाज़े पर उसकी पत्नी और बच्चे इस तरह इंतज़ार कर रहे थे जैसे किसी बंजर बाग़ को पहली बारिश का इंतज़ार हो। नन्ही मुन्नी ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया। उसकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए नरमी से पूछा
“काम हो गया? कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों में भर लिया। उस स्पर्श में वह अपनापन और सुकून था जो उसे दुनिया के किसी कोने में नहीं मिला था। उसके दिल का बोझ हल्का हो चुका था। उसने जान लिया था कि ज़िंदगी की असली खुशी बिखरे हुए रिश्तों को समेटने और वर्तमान की मोहब्बत को गले लगाने में है।
अब उसका दिल एक ऐसे समंदर की तरह था जहाँ पुरानी यादें गहराई में कहीं शांत हो गई थीं और सतह पर उसके परिवार की ख़ुशियों की लहरें नाच रही थीं। वह एक नए सफ़र पर निकल चुका था, जहाँ रोशनी थी, सुकून था और अपना घर था।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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