मुक्तक/दोहा

विचारणीय

हार कर भी हार जो मानता नही,
हार के कारणों पर विचारता नही।
सोचता स्वयंभू, अजर अमर सदा,
पानी का बुलबुला, पहचानता नही।

जीत में भी हार में भी, अविचल चलने की चाह,
परिणाम की परवाह बिन, कर्म करने की चाह।
नहीं बचा रावण यहाँ, न ही अस्तित्व कंस का,
वह अमर हो गया, समाज हित जीने की चाह।

हो नहीं ममता अगर तो नाम रख कर क्या करोगे,
माया के बन्धनों में उलझे, बिन माया क्या करोगे?
कर्म लेकर साथ आये पर, हाथ तो खाली ही थे,
मोह माया ममता निरापद, संग्रह कर क्या करोगे?

जब तजोगे इस जगत को, ख़ाली हाथ जाना पड़ेगा,
कर्मों का संचय जगत में, जगत को ले जाना पड़ेगा।
मृत्यु के सम्मुख सभी जन, बेबस और लाचार रहते,
कर्मों से मूल्यांकन सभी का, कर्म ही ले जाना पड़ेगा।

जानते हैं सब यह, पर मानता कोई नहीं,
पाप से बचना मगर, ठानता कोई नहीं।
अर्थ को सर्वस्व माने, पर सार नही जाना,
मृत्यु सम्मुख व्यर्थ, पहचानता कोई नही।

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन

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