हारे प्रत्याशी की मनोदशा
बेचारे चुनाव हार गये। बड़ी उम्मीद थी। कर्जा लेकर चुनाव लड़े थे। पूरा दांव लगा बैठे थे। साम, दाम, दंड और भेद की पूरी रणनीति लगा दी। यहाँ तक कि चाणक्य नीति का कोना-कोना प्रयोग किये थे। एक-एक मतदाता का पैर छुये थे। सारे धार्मिक स्थलों पर माथा टेका था। ससुरी के… अपना मनहूस चेहरा भी देखने का मन नहीं करता।
पतिदेव की करारी पराजय पर पत्नी के चेहरे की सौंदर्य धूमिल नजर आ रही है। मन ही मन कह रही है कि मना कर रहे थे। चुनाव में अपना दांवपेंच कमजोर है। हार जाओगे। मेरे सारे गहने बेंच दिये। मायके से मिले गहने को भी नहीं बक्शा। लम्बा-लम्बा सपना देखने की क्या जरूरत थी? तब तो कह रहे थे। चुनाव एकतरफा है। जीत सुनिश्चित है। मंत्री पद तो दौड़ते हथिया लेंगे।
आखिर जनता का श्राप लग गया। नियत पहले से खराब थी। कह रहे थे कि जनता पैसे की झोली लेकर मेरे कदमों पर पटक देगी। उसका काम केवल मैं ही करूँगा। जनता भगवान का रूप होते हैं। उनके साथ छल करने वाले खुद छलें जायेंगे।
एक-एक से बदला लूंगा। जिसने मेरा खाया और गाना दूसरे का गाया। एक-एक को पहचानता हूँ। टांग तोड़ दूंगा कमीने का..। सब जो मेरा जय-जयकार बोलते थे। मेरे गले में माला पहना देते थे। एक थाली में खाने वाले चोखामल, सेवालाल, तुफानीलाल रात दिन मेरे साथ लगे रहे। अपने थाली में खिलाया हूँ। मेरा साथ छोड़कर मेरे विपक्षी के साथ मटर-पनीर खा रहे हैं।
हारे प्रत्याशी महोदय के घर पर मातम पसरा है। एक भयंकर चिंता में डूबे हुए हैं। चेहरा अस्त-व्यस्त है। बालों की रौनक गायब है। पत्नी भी सिर पर हाथ रखकर अफसोस में है कि जीत जाते तो मायके में मेरी और कद्र बढ़ जाती। पड़ोसियों में मेरी साख बन जाती। मेरा झुमका तक बिक गया। नौलखा हार का सपना सब टूट गया। हाय रे, निगोड़ा चुनाव…।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
