कीका से महाराणा तक: त्याग और बलिदान की कहानी
कुम्भलगढ़,राजस्थान में महाराणा उदयसिंह रानी जयवन्ता बाई के घर में जन्में महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में २८ फरवरी १५७२ को सम्पन्न हुवा था। महाराणा प्रताप के शासनकाल का सबसे रोचक तथ्य यही है कि अकबर बिना लड़े अर्थात बिना युद्ध किये महाराणा जी को अपने अधीन रखना चाहता था।और इसलिये उसने अपने विश्वस्त विभिन्न दूतों के माध्यम से कई बार चेष्टा की लेकिन राणा प्रताप जी को मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं थी। फलस्वरूप हल्दी घाटी में ऐतिहासिक युद्ध आमने-सामने लड़ा गया और यह युद्ध अनिर्णीत रहा था। लेकिन इसमें जान-माल की बहुत क्षति हुई। जनश्रुति अनुसार जब वे थके थकाये जंगल में रह रहे थे तब सुरक्षा की दृष्टि से जगह बदलते रहते थे। इस क्रम में इनकी मुलाकात वहाॅं सन्त गोस्वामी तुलसीदास जी से होती है और इनकी निराशा और थकान को देख गोस्वामी जी ने इनमें जोश भरते हुवे कहा – प्रभु श्री रामजी का रक्त जिसकी धमनियों में दौड़ रहा हो उसे निराश होने की कतई अवश्यकता नहीं होनी चाहिये।
प्रत्युत्तर में राणा प्रतापजी ने जब अपने एकदम अकेले पड़जाने वाली बात बतायी तब गोस्वामीजी ने महाराणा की आँखों में झाँकते हुवे पूछ लिया – क्या मेरे प्रभु श्रीरामजी वन में अकेले नहीं थे ? उन्होंने सीता मैया को ढूँढने से हार तो नहीं मानी थी। अतः, तुम कहते हो कि अकेले पड़ गए हो तो प्रभु श्री रामजी की राह क्यों नहीं चलते ?
आगे मुस्कुराते हुए गोस्वामीजी ने पूछा – प्रभु श्री रामजी ने रावण से युद्ध किसके साथ मिलकर किया था ?जब महाराणा ने जबाब में कहा – “वानरों के साथ”। तब बिना देर किए गोस्वामीजी ने कहा – “तो पहचानिये अपने वानरों को, हनुमानों को। ये वनवासी कोल-भील आपके लिए वही वानर हैं।”
गोस्वामीजी ने ओजस्वी स्वर में महाराणा को बताया – इन कोल भीलों के मन में तुम्हारे लिए बहुत सम्मान है। तुमने ही तो कहा था न – “राणी जाया, भीली जाया, भाई भाई!”यह सुन महाराणा के शरीर में जोश का संचार हुवा और आँखों में चमक उभरने लगी क्योंकि इन्हें अपने बचपन के वे दिन याद आ गये जब उस समय ये इस समुदाय के बीच रह कर अपने हमउम्र वालों के साथ युद्ध कला सीखी और इस समुदाय के बड़े – बुजुर्ग इन्हें प्यार से ‘कीका’ (बेटा)[भील समुदाय में अपने लड़कों को ‘कीका’ पुकारा जाता है] कहकर बुलाते थे।
उनकी आँखों में चमक भाँप गोस्वामीजी ने बिना देर किये सलाह देते हुवे कहा — “इन कोल – भीलों को, इस जंगल/वन को ही अपनी शक्ति बनाओ।मेरे प्रभु श्री रामजी आपके सहायक बन सब मँगल करेंगे।” इस प्रकार गोस्वामीजी से आशीर्वाद प्राप्त हो जाने पर महाराणा प्रतापजी की आँखें दमक उठी।
उसके बाद इतिहास गवाह है कि राणा प्रतापजी ने छापामार (जिसे स्थानीय भाषा में ‘भाटा-झूटा’ या ‘गोरिल्ला युद्ध’) रणनीति का सहारा ले मुगलों को न केवल मेवाड़ से खदेड़ दिया बल्कि चित्तौड़गढ़ व माँडलगढ़ को छोड़ शेष अधिकांश मेवाड़ को वापस जीतने में सफलता हासिल की थी।
अन्त में आपको यही बताना है कि इस सफलता से प्रेरित हो राणा प्रतापजी ने छापामार रणनीति को अपनाये रखा और इसी रणनीति के सहारे मृत्युपर्यन्त, अपनी लड़ाई मुगलों के खिलाफ जारी रखने में कामयाब रहे थे।
— गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
