पाठक न्यायाधीश की तरह होता है
मैं हास्य-व्यंग्य रचनायें लिखता रहता हूँ। लिखना अच्छा लगता है। पाठकगण जब पढ़ कर वाह-वाह कर उठते हैं। मेरा भी मन गदगद हो जाता है कि मेरी रचना लोगों के मन मस्तिष्क को उद्वेलित कर रही है। मैं उन तमाम पाठकों के प्रति बहुत आभारी हूँ जो मेरा उत्साहवर्धन करते हैं। अपना कीमती समय देते हैं।
पाठकों का स्नेह मेरे लिए किसी टानिक से कम नहीं होता है। लिखते समय मेरे अंदर ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रवाह होने लगता है और मैं लिखते जाता हूँ। बाद में पढ़कर मैं महसूस करता हूँ कि इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कर दिया लेकिन ऐसे शब्दों, वाक्यों को मैं जिंदगी में सोंचा भी नहीं था कि इस तरह के वाक्य लोगों के दिलो-दिमाग में हलचल पैदा कर देगी।
सच में लेखकों को नई ताकत एवं उर्जा पाठकों से मिलती है। वह पाठक ही होता है जो सच उगलता है और बताता है कि आपकी रचना समाज के लिए कितना असरकारक है। कितना नाजुक मुद्दा आपने उठाया है। सच बताने की ताकत आपकी रचना बताती है तो पाठक भी सच बताने में निर्भीक हो जाता है। वह पाठक ही होता है बिना लागलपेट के सच्ची आलोचना करता है। वह सच्चा आलोचक होता है।
वह किसी के बहकावे में नहीं होता है। किसी का गुलाम नहीं होता है। रचनाओं को पढ़कर सच्चा साक्षात्कार करता है। पाठक एक न्यायाधीश की तरह होता है। वह न्याय की कुर्सी पर बैठता है। बिना किसी चढ़ावा के बिल्कुल निष्पक्ष एवं बेबाक होकर रचना के साथ स्पष्ट निर्णय देता है।
पाठकों को मैं चाटुकार की श्रेणी में नहीं रखूंगा। कुछ अपाठक होते हैं चाटुकार। केवल अपने चहेते लेखक पर अपनी मोहर बिना पढ़े ही रचना पर ठोंक देते हैं। यह गलत है। बिना रचना पढ़े आपने कह दिया जबरदस्ती वाह-वाह। पता चला कि एकदम बेढंगी रचना है। उस रचना में कोई खुशबू नही है फिर भी नाक सिकोड़- सिकोड़ कर उस रचना से अंगुली टेढ कर खुशबू निकालने का प्रयास कर रहे हैं।
नकली टाइप के पाठकों को असली पाठक बनने की सलाह दूंगा। वे झूठी तारीफ न करें। सच को उगलें। सच की भट्टी में तपा लेखक एक परिपक्व लेखक बनता है। परिपक्व लेखक बनने में पाठकों का सम्पूर्ण हाथ होता है। मैं उन तमाम पाठकों का ह्रदय से आभार व्यक्त करता है जो हमें हौंसला देते हैं। अपना कीमती समय देते हैं और हमें सकारात्मक दवा की घूंट पिलाते रहते हैं। वे लेखकों के भगवान होतें हैं।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
